तुझ पर टिकी आँखें
दाऊद का एक भजन।
141 1 हे मेरे परमपिता, मैं तुझे पुकारता हूँ; शीघ्र आ मेरे पास। जब मैं तुझे पुकारूँ तब मेरी आवाज़ सुन ले।
2 मेरी प्रार्थना तेरे सम्मुख धूप के समान चढ़े, और मेरे हाथों का उठाया जाना सांझ के बलिदान के समान हो।
3 हे मेरे परमपिता, मेरे मुँह पर पहरा बैठा; मेरे होंठों के द्वार की रखवाली कर। 4 मेरे मन को किसी बुराई की ओर न झुकने दे, कि मैं बुरे कामों में कुकर्मियों के संग सम्मिलित हो जाऊँ; और मुझे उनके स्वादिष्ट भोजन का रसास्वादन न करने दे।
5 धर्मी मुझे मारे तो वह कृपा है; वह मुझे सुधारे तो वह मेरे सिर के लिए तेल है; मेरा सिर उसे अस्वीकार न करेगा। तौभी मेरी प्रार्थना सदा दुष्टों के कामों के विरुद्ध रहती है।
6 जब उनके शासक चट्टानों की चोटियों पर से गिराए जाएँगे, तब लोग मेरी बातें सुनेंगे, क्योंकि वे मनभावनी हैं। 7 जैसे कोई भूमि को जोतकर तोड़ डालता है, वैसे ही हमारी हड्डियाँ कब्र के मुँह पर बिखर गई हैं।
8 परन्तु मेरी आँखें टिकी हैं तुझ पर, हे मेरे प्रभु परमपिता; मैं तुझी में शरण लेता हूँ—मुझे असहाय न छोड़। 9 मुझे उस फंदे से बचा जो उन्होंने मेरे लिए लगाया है, और कुकर्मियों के जालों से बचा। 10 दुष्ट अपने ही जालों में फँस जाएँ, और मैं अकेला सुरक्षित निकल जाऊँ।