मेरी सहायता कहाँ से आती है?
यात्रा का गीत।
121 1 मैं अपनी आँखें पहाड़ों की ओर उठाता हूँ—मेरी सहायता कहाँ से आएगी?
2 मेरी सहायता मेरे परमपिता की ओर से आती है, जो आकाश और पृथ्वी के कर्ता हैं।
3 वह तेरे पाँव को डगमगाने न देगा; तेरा रक्षक ऊँघने न पाएगा। 4 देख, इस्राएल का रक्षक न ऊँघेगा और न सोएगा।
5 तेरे परमपिता तेरी रक्षा करते हैं; तेरे परमपिता तेरे दाहिने हाथ की ओर तेरी छाया हैं। 6 न दिन को धूप तुझे हानि पहुँचाएगी, और न रात को चाँद।
7 तेरे परमपिता तुझे सारी बुराई से बचाएँगे; वे तेरे प्राण की रक्षा करेंगे। 8 तेरे परमपिता तेरे आने-जाने में तेरी रक्षा करेंगे, अब से लेकर सर्वदा तक।