यात्रा का गीत।
120 1 अपने संकट में मैंने हमारे परमपिता को पुकारा, और उसने मुझे उत्तर दिया।
2 हे मेरे परमपिता, मुझे झूठ बोलनेवाले होंठों से, छली जीभ से बचा। 3 हमारे परमपिता तुझे क्या देंगे, और हे छली जीभ, वह तुझ पर और क्या बढ़ाएँगे? 4 किसी योद्धा के तीखे तीर, झाऊ के जलते हुए अंगारों के साथ। a a v4 झाऊ एक मरुस्थलीय झाड़ी है जिसका कोयला बहुत तेज़ और बहुत लंबे समय तक जलता है।
5 हाय मुझ पर, कि मैं मेशेक में रहता हूँ, कि मैं केदार के तंबुओं के बीच बसा हूँ! b b v5 मेशेक बहुत दूर उत्तर में और केदार बहुत दूर दक्षिण-पूर्व में अरब के मरुस्थल में स्थित था — ज्ञात संसार के दो विपरीत छोरों पर के स्थान, जिनका नाम एक साथ इसलिए लिया गया कि शत्रुतापूर्ण परदेशियों से घिरे जीवन का चित्र दिखाया जा सके। 6 बहुत समय से मैं शांति के बैरियों के बीच रहता आया हूँ। 7 मैं तो शांति के पक्ष में हूँ; परन्तु जब मैं बोलता हूँ, तब वे युद्ध के पक्ष में होते हैं।