प्रधान गवैये के लिये। दाऊद का एक भजन।
64 1 हे मेरे पिता, मेरे विलाप में मेरी सुन ले; शत्रु के आतंक से मेरे प्राण की रक्षा कर। 2 मुझे दुष्टों की गुप्त युक्ति से छिपा ले, कुकर्मियों की कोलाहल करती भीड़ से। 3 वे अपनी जीभ तलवार के समान तेज करते हैं; वे अपने कड़वे वचनों को तीरों के समान ताकते हैं, 4 कि घात में से खरे मनुष्य पर चलाएँ; वे अचानक और निडर होकर उस पर तीर छोड़ते हैं। 5 वे अपने बुरे उद्देश्य पर दृढ़ रहते हैं; वे फंदे छिपाने की चर्चा करते हैं और कहते हैं, “उन्हें कौन देखेगा?”
6 वे अन्याय की युक्ति रचते हैं और कहते हैं, “हमने एक भली भाँति सोची-समझी योजना पूरी कर ली है।” मनुष्य के मन के भीतरी विचार और हृदय गहरे हैं। 7 परन्तु हमारे परमपिता उन पर तीर चलाएँगे; अचानक वे घायल हो जाएँगे। 8 वे ठोकर खिलाए जाते हैं; उनकी अपनी ही जीभ उनके विरुद्ध हो जाती है; जितने उन्हें देखेंगे, सब सिर हिलाएँगे।
9 तब सब मनुष्य डर जाएँगे; वे हमारे परमपिता के काम का प्रचार करेंगे और उसके किए हुए कामों पर ध्यान करेंगे। 10 धर्मी हमारे परमपिता में आनन्दित हों और शरण लें उसमें; सब सीधे मनवाले जयजयकार करें!