इस्राएल का उत्तरजीविता का गीत
यात्रा का गीत।
129 1 “उन्होंने मेरी जवानी से ही मुझ पर बहुत अत्याचार किया” — अब इस्राएल यह कहे — 2 “उन्होंने मेरी जवानी से ही मुझ पर बहुत अत्याचार किया, फिर भी वे मुझ पर प्रबल न हो सके।” 3 हल चलानेवालों ने मेरी पीठ पर हल चलाया; उन्होंने अपनी रेखाएँ लम्बी खींचीं। 4 हमारे परमपिता धार्मिक हैं; उन्होंने दुष्टों के बन्धन काट डाले हैं।
5 जितने सिय्योन से बैर रखते हैं, वे सब लज्जित होकर पीछे हटा दिए जाएँ। 6 वे छतों की घास के समान हो जाएँ, जो बढ़ने से पहले ही मुरझा जाती है, 7 जिससे न तो लवनेवाला अपनी मुट्ठी भरता है, और न पूले बाँधनेवाला अपनी बाँह, 8 और न पास से जानेवाले यह कहते हैं, “हमारे परमपिता की आशीष तुम पर हो! हम हमारे परमपिता के नाम से तुम्हें आशीष देते हैं।”