जब तक वही न बनाए
आरोहण का गीत। सुलैमान का।
127 1 जब तक हमारे परमपिता घर न बनाएँ, तब तक उसके बनानेवाले व्यर्थ ही परिश्रम करते हैं। जब तक हमारे परमपिता नगर की रखवाली न करें, तब तक पहरुआ व्यर्थ ही जागता रहता है। 2 व्यर्थ ही तुम सवेरे जल्दी उठते हो और देर तक जागते हो, और चिन्ता-भरे परिश्रम की रोटी खाते हो; क्योंकि वह अपने प्रिय जन को नींद देते हैं।
3 सन्तान हमारे परमपिता की ओर से मिली मीरास है, और गर्भ का फल उसका प्रतिफल है। 4 जैसे वीर के हाथ में तीर होते हैं, वैसे ही जवानी की सन्तान होती है। 5 धन्य है वह पुरुष जो अपना तरकश उनसे भर लेता है! वह लज्जित न होगा जब वह फाटक में अपने शत्रुओं से बातें करेगा। a a v5 नगर का फाटक वह सार्वजनिक सभा-स्थल था जहाँ कानूनी विवाद और समुदाय के मामले निपटाए जाते थे — अनेक पुत्रों का होना वहाँ अपने पक्ष में बलवन्त पैरोकारों का होना था।