मेरा शरणस्थान
प्रधान बजानेवाले के लिये। दाऊद का भजन।
11 1 अपने परमपिता में मैंने शरण ली है। तुम कैसे कह सकते हो मेरे प्राण से, “पक्षी की नाईं अपने पहाड़ पर उड़ जा”? 2 क्योंकि देखो — दुष्ट अपने धनुष चढ़ाते हैं; वे अपना तीर डोरी पर रखते हैं, कि अन्धियारे में से सीधे मनवालों पर चलाएँ। 3 जब नींवें ढा दी जाती हैं, तब धर्मी क्या कर सकता है? 4 हमारे परमपिता अपने पवित्र मन्दिर में हैं; हमारे परमपिता का सिंहासन स्वर्ग में है। उनकी आँखें देखती रहती हैं; उनकी दृष्टि मनुष्य की सन्तानों को परखती है। 5 हमारे परमपिता धर्मी को परखते हैं, परन्तु उनका प्राण दुष्ट से घृणा करता है और उपद्रव के प्रेमी से। 6 दुष्टों पर वे फन्दे बरसाएँगे — आग और गन्धक और झुलसाती लू उनके कटोरे का भाग होगी। 7 क्योंकि हमारे परमपिता धर्मी हैं; वे धर्म के कामों से प्रेम रखते हैं। सीधे मनवाले उनका मुख देखेंगे। a a v7 यह भजन जिस सबसे गहरे प्रतिफल का नाम लेता है वह सुरक्षा नहीं, परन्तु हमारे परमपिता का मुख देखना है — सीधे मनवाले उन्हीं के हैं, और उनके संग रहना ही सब कुछ का सार है।