हमारे परमपिता कभी असफल नहीं होते
3 1तो फिर यहूदी को क्या लाभ है? या खतने का क्या मूल्य है? 2हर प्रकार से बहुत कुछ। सबसे पहले तो यह कि हमारे परमपिता के वचन उन्हीं को सौंपे गए। 3तो फिर क्या? यदि कुछ लोग विश्वासघाती निकले, तो क्या उनकी अविश्वासयोग्यता हमारे परमपिता की विश्वासयोग्यता को व्यर्थ कर देगी? 4कदापि नहीं! हमारे परमपिता सच्चे ठहरें, चाहे हर मनुष्य झूठा हो। जैसा लिखा है: “तू अपने वचनों में धर्मी ठहरे, और न्याय में विजयी हो।”
5परन्तु यदि हमारा अधर्म हमारे परमपिता की धार्मिकता को उजागर करता है, तो हम क्या कहें? क्या हमारे परमपिता हम पर क्रोध लाकर अन्यायी ठहरते हैं? (मैं मनुष्य की रीति से कहता हूँ।)। 6कदापि नहीं! अन्यथा हमारे परमपिता जगत का न्याय कैसे करेंगे? 7परन्तु यदि मेरे झूठ के कारण हमारे परमपिता का सत्य उनकी महिमा के लिए और भी बढ़ जाता है, तो फिर मैं क्यों अब भी पापी के रूप में दोषी ठहराया जाता हूँ? 8और यह क्यों न कहें, जैसा कुछ लोग हम पर झूठा दोष लगाते हुए कहते हैं कि हम ऐसा कहते हैं, “आओ, हम बुराई करें कि भलाई निकले”? ऐसे लोगों का दण्ड न्यायसंगत है।
कोई भी धर्मी नहीं
9तो फिर क्या? क्या हम उनसे अच्छे हैं? कदापि नहीं—क्योंकि हम पहले ही यह दोष लगा चुके हैं कि यहूदी और यूनानी सब समान रूप से पाप के वश में हैं, 10जैसा लिखा है: “कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं; 11कोई समझदार नहीं; कोई हमारे परमपिता को नहीं ढूँढ़ता। 12सब भटक गए हैं; सब मिलकर निकम्मे हो गए हैं; कोई भला नहीं करता, एक भी नहीं। 13उनका गला खुली कब्र है; वे अपनी जीभ से छल करते हैं।” “उनके होठों के नीचे साँपों का विष है। 14उनका मुँह शाप और कड़वाहट से भरा है। 15उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं; 16उनके मार्गों में विनाश और दुर्दशा है, 17और शान्ति का मार्ग उन्होंने नहीं जाना। 18उनकी आँखों के सामने हमारे परमपिता का भय नहीं है।”
19हम जानते हैं कि व्यवस्था जो कुछ कहती है, वह उन्हीं से कहती है जो व्यवस्था के अधीन हैं, ताकि हर एक मुँह बन्द हो जाए और सारा जगत हमारे परमपिता के सामने उत्तरदायी ठहरे। 20व्यवस्था के कामों से कोई भी उनके सामने धर्मी नहीं ठहरता; व्यवस्था तो पाप की पहचान कराती है।
यीशु पर विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना
21परन्तु अब व्यवस्था के बिना हमारे परमपिता की धार्मिकता प्रकट हुई है, जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता देते हैं। 22हमारे परमपिता की यह धार्मिकता यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा उन सब पर आती है जो विश्वास करते हैं, क्योंकि कोई भेद नहीं, 23इसलिए कि सब ने पाप किया है और हमारे परमपिता की महिमा से रहित हैं, 24और उनके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। 25हमारे परमपिता ने उन्हें उनके लहू पर विश्वास के द्वारा प्रायश्चित का बलिदान ठहराया, ताकि अपनी धार्मिकता प्रकट करें, क्योंकि अपनी सहनशीलता में उन्होंने पहले किए हुए पापों को अनदेखा कर दिया था, 26ताकि इस समय अपनी धार्मिकता प्रकट करें, कि वे स्वयं धर्मी रहें और जो कोई यीशु पर भरोसा करे उसे भी धर्मी ठहराने वाले हों।
27तो फिर घमण्ड कहाँ रहा? वह तो जाता रहा। किस व्यवस्था के कारण? कामों की? नहीं—विश्वास की व्यवस्था के कारण। 28क्योंकि हम यह मानते हैं कि मनुष्य व्यवस्था के कामों के बिना विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरता है। 29अथवा क्या हमारे परमपिता केवल यहूदियों के पिता हैं? क्या अन्यजातियों के भी नहीं? हाँ, अन्यजातियों के भी, 30क्योंकि हमारे परमपिता एक ही हैं, वे खतना किए हुओं को विश्वास से और बिना खतना किए हुओं को भी विश्वास ही के द्वारा धर्मी ठहराएँगे।
31तो क्या हम इस विश्वास के द्वारा व्यवस्था को रद्द करते हैं? कदापि नहीं—हम तो व्यवस्था को स्थिर करते हैं।