हमारे परमपिता के न्याय से कोई नहीं बचता
2 1इसलिए हे मनुष्य, तू कोई भी क्यों न हो, जब तू दूसरे पर दोष लगाता है तो तेरे पास कोई बहाना नहीं; क्योंकि दूसरे पर दोष लगाते हुए तू अपने आप को दोषी ठहराता है, इसलिए कि तू भी वही काम करता है। 2अब हम जानते हैं कि जो ऐसे काम करते हैं, उन पर हमारे परमपिता का न्याय ठीक ही होता है। 3हे मनुष्य, तू जो ऐसे काम करने वालों पर दोष लगाता है और स्वयं भी वही करता है, क्या तू यह समझता है कि तू हमारे परमपिता के न्याय से बच जाएगा? 4अथवा क्या तू उसकी कृपा, सहनशीलता और धीरज के धन को तुच्छ जानता है, और यह नहीं समझता कि हमारे परमपिता की कृपा तुझे मन फिराने की ओर ले चलने के लिये है? 5पर अपने कठोर और अनपछताए मन के कारण तू उस क्रोध के दिन के लिये, जब हमारे परमपिता का धर्ममय न्याय प्रगट होगा, अपने लिये क्रोध कमाता जाता है। 6वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा। 7जो धीरज के साथ भले काम करते हुए महिमा, आदर और अमरता की खोज में रहते हैं, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा। 8पर जो स्वार्थी हैं, और सत्य को नहीं मानते, वरन अधर्म के पीछे चलते हैं, उन पर क्रोध और कोप होगा। 9हर एक मनुष्य पर, जो बुराई करता है, क्लेश और संकट आ पड़ेगा—पहले यहूदी पर, फिर यूनानी पर, 10पर महिमा, आदर और शान्ति हर एक के लिये जो भला करता है—पहले यहूदी के लिये, फिर यूनानी के लिये भी। 11क्योंकि हमारे परमपिता किसी का पक्षपात नहीं करते। 12जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे; और जिन्होंने व्यवस्था के अधीन होकर पाप किया, उनका न्याय व्यवस्था के अनुसार होगा। 13क्योंकि व्यवस्था के सुनने वाले हमारे परमपिता के सामने धर्मी नहीं, पर व्यवस्था के मानने वाले धर्मी ठहराए जाएंगे। 14क्योंकि जब अन्यजाति, जिनके पास व्यवस्था नहीं, स्वभाव ही से व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था न रखते हुए भी व्यवस्था उनके भीतर काम करती है। 15वे व्यवस्था का काम अपने हृदयों पर लिखा हुआ दिखाते हैं, और उनका विवेक भी गवाही देता है, और उनके परस्पर विरोधी विचार कभी उन पर दोष लगाते और कभी उनका पक्ष लेते हैं। 16यह उस दिन होगा, जब हमारे परमपिता मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा सब मनुष्यों के गुप्त भेदों का न्याय करेंगे। a a v16 हमारे परमपिता ही न्यायी हैं, फिर भी वे अपने पुत्र के द्वारा न्याय करते हैं—परमपिता ने सारा न्याय यीशु को सौंप दिया है।
व्यवस्था तुम्हें नहीं बचाएगी
17पर यदि तू अपने आप को यहूदी कहता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और हमारे परमपिता पर घमंड करता है, 18और हमारे परमपिता की इच्छा को जानता है, और व्यवस्था से शिक्षा पाकर उत्तम बातों को परखता है, 19और तुझे यह भरोसा है कि तू अंधों का अगुवा, और अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, 20और निर्बुद्धियों का सुधारने वाला, और बालकों का सिखाने वाला है, और तेरे पास व्यवस्था में ज्ञान और सत्य का स्वरूप है। 21तो क्या तू जो औरों को सिखाता है, अपने आप को नहीं सिखाता? तू जो चोरी न करने का उपदेश देता है, क्या आप ही चोरी करता है? 22तू जो कहता है कि व्यभिचार न करना, क्या आप ही व्यभिचार करता है? तू जो मूर्तियों से घृणा करता है, क्या आप ही मन्दिरों को लूटता है? 23तू जो व्यवस्था पर घमंड करता है, क्या व्यवस्था का उल्लंघन करके हमारे परमपिता का अनादर करता है? 24जैसा लिखा है: “तुम्हारे कारण अन्यजातियों में हमारे परमपिता के नाम की निन्दा होती है।” 25यदि तू व्यवस्था पर चले, तो खतने से लाभ तो है, पर यदि तू व्यवस्था का उल्लंघन करे, तो तेरा खतना बिना खतने के समान हो जाता है। 26इसलिये यदि खतनारहित व्यक्ति व्यवस्था के नियमों को माने, तो क्या उसकी खतनारहित दशा खतने के तुल्य न गिनी जाएगी? 27और जो शारीरिक रूप से खतनारहित है, यदि वह व्यवस्था को पूरा करे, तो वह तुझे, जो लेख और खतना रखते हुए भी व्यवस्था का उल्लंघन करता है, दोषी ठहराएगा। 28क्योंकि वह यहूदी नहीं जो केवल बाहरी रूप से यहूदी है, और न वह खतना है जो केवल शरीर में बाहरी रूप से होता है। 29पर यहूदी वही है जो भीतर से है, और खतना वही है जो हृदय का है, आत्मा में, न कि लेख में; ऐसे मनुष्य की प्रशंसा मनुष्यों की ओर से नहीं, परन्तु हमारे परमपिता की ओर से होती है।