इस्राएल के लिए पौलुस का हृदय
10 1हे भाइयो और बहनो, इस्राएल के लिए मेरे हृदय की अभिलाषा और हमारे परमपिता से मेरी प्रार्थना यह है कि उनका उद्धार हो। 2मैं उनके विषय में यह गवाही देता हूँ कि उनमें हमारे परमपिता के लिए धुन तो है, परन्तु ज्ञान के अनुसार नहीं। 3क्योंकि हमारे परमपिता की धार्मिकता से अनजान रहकर, और अपनी धार्मिकता स्थापित करने का प्रयत्न करते हुए, उन्होंने हमारे परमपिता की धार्मिकता के अधीन अपने आपको नहीं किया। 4क्योंकि मसीह व्यवस्था का लक्ष्य है, ताकि जो कोई विश्वास करे वह धार्मिकता प्राप्त करे।
5क्योंकि मूसा उस धार्मिकता के विषय में लिखता है जो व्यवस्था पर आधारित है: “जो मनुष्य इन बातों पर चलेगा, वह उन्हीं के कारण जीवित रहेगा।”
6परन्तु विश्वास पर आधारित धार्मिकता यह कहती है: “अपने मन में यह न कहना, ‘स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा?’” (अर्थात् मसीह को उतार लाने के लिए)। 7“या ‘गहरे गड्ढे में कौन उतरेगा?’” (अर्थात् मसीह को मरे हुओं में से ऊपर ले आने के लिए)। 8परन्तु वह क्या कहती है? “वचन तेरे निकट है, तेरे मुँह में और तेरे मन में है”—अर्थात् विश्वास का वही वचन जिसका हम प्रचार करते हैं: 9यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु मानकर अंगीकार करे और अपने मन में विश्वास करे कि हमारे परमपिता ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा। 10क्योंकि मन से विश्वास किया जाता है और हमारे परमपिता के सामने धर्मी ठहराया जाता है, और मुँह से अंगीकार किया जाता है और उद्धार पाया जाता है। 11क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, “जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा।” 12यहूदी और यूनानी में कुछ भेद नहीं: वही एक प्रभु सब का प्रभु है, और अपने सब पुकारनेवालों के लिए उदार है। 13क्योंकि “जो कोई हमारे प्रभु यीशु के नाम को पुकारेगा, वह उद्धार पाएगा।” a a v13 पौलुस इस प्रतिज्ञा को कि “जो कोई यहोवा के नाम को पुकारेगा, वह उद्धार पाएगा,” लेकर यीशु पर लागू करता है — प्रभु को पुकारना ही उसे पुकारना है।
14तो फिर वे जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, उसे कैसे पुकारें? और जिसके विषय में उन्होंने सुना ही नहीं, उस पर कैसे विश्वास करें? और बिना प्रचारक के कैसे सुनें? 15और जब तक भेजे न जाएँ, तब तक वे उसका प्रचार कैसे करें? जैसा लिखा है: “उनके पाँव क्या ही सुहावने हैं जो सुसमाचार सुनाते हैं!”
16परन्तु सब ने सुसमाचार को नहीं माना, क्योंकि यशायाह कहता है, “हे हमारे परमपिता, हमारे समाचार पर किसने विश्वास किया?” 17इसलिए विश्वास सुनने से आता है, और सुनना मसीह के विषय के वचन के द्वारा। 18परन्तु मैं पूछता हूँ: क्या उन्होंने नहीं सुना? हाँ, अवश्य सुना: “उनका शब्द सारी पृथ्वी पर, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए।”
19परन्तु मैं पूछता हूँ, क्या इस्राएल नहीं जानता था? पहले मूसा कहता है: “मैं तुम्हें उनके द्वारा डाह दिलाऊँगा जो जाति ही नहीं, और एक निर्बुद्धि जाति के द्वारा तुम्हें क्रोध दिलाऊँगा।”
20और यशायाह बड़े साहस से यह कहता है, “जो मुझे नहीं ढूँढ़ते थे, उन्होंने मुझे पा लिया; जो मुझे नहीं पूछते थे, उन पर मैं प्रगट हुआ।”
21परन्तु इस्राएल के विषय में वह कहता है, “दिन भर मैं एक आज्ञा न माननेवाली और विवाद करनेवाली प्रजा की ओर अपने हाथ पसारे रहा।”