हमारे परमपिता भले हैं
आसाप का एक भजन।
73 1 सचमुच हमारे परमपिता इस्राएल के लिये भले हैं, अर्थात् उनके लिये जो मन के शुद्ध हैं।
2 परन्तु मेरे तो पाँव फिसलने ही पर थे; मेरे डग लगभग बहक गए थे। 3 क्योंकि मैं घमण्डियों से डाह करने लगा जब मैं ने दुष्टों का कुशल देखा। 4 क्योंकि मरने में उनको कोई पीड़ा नहीं होती; उनके शरीर हृष्ट-पुष्ट और चिकने रहते हैं। 5 उन पर औरों के समान कष्ट नहीं आते; और अन्य मनुष्यों के समान उन पर विपत्ति नहीं पड़ती। 6 इस कारण घमण्ड उनके गले का हार बना है; उपद्रव उन्हें वस्त्र के समान ढाँपे रहता है। 7 उनकी आँखें चर्बी से निकली पड़ती हैं; उनके मन की कल्पनाएँ उमड़ती रहती हैं। 8 वे ठट्ठा करते और दुर्भाव से बातें करते हैं; वे ऊँचे स्थान से अंधेर की धमकी देते हैं। 9 वे अपने मुँह को आकाश के विरुद्ध खोलते हैं, और उनकी जीभ पृथ्वी पर अकड़ती फिरती है। 10 इस कारण उसकी प्रजा उनकी ओर फिर जाती है, और भरपूर जल पी लेती है। 11 और वे कहते हैं, “परमेश्वर कैसे जानता है? क्या परमप्रधान को कुछ ज्ञान है?” 12 देखो, ये तो दुष्ट हैं; ये सदा सुख से रहते हुए धन-सम्पत्ति बढ़ाते जाते हैं।
13 निश्चय मैं ने व्यर्थ ही अपने मन को शुद्ध रखा और अपने हाथों को निर्दोषता में धोया है। 14 क्योंकि दिन भर मुझ पर विपत्ति पड़ती रही, और प्रति भोर मुझे दण्ड मिलता रहा।
15 यदि मैं ने कहा होता, “मैं भी ऐसे ही बोलूँगा,” तो मैं तेरे बच्चों की पीढ़ी के साथ विश्वासघात करता। 16 जब मैं ने इन सब बातों को समझने का यत्न किया, तब यह मेरी दृष्टि में थका देने वाला काम जान पड़ा, 17 जब तक मैं पवित्रस्थान में न गया, हमारे परमपिता के; तब मैं ने उनके अन्त को समझ लिया। 18 निश्चय तू उन्हें फिसलनी भूमि पर रखता है; तू उन्हें गिराकर सत्यानाश कर देता है। 19 वे क्षण भर में कैसे उजड़ गए! वे भयंकर विपत्तियों से पूरी तरह मिट गए! 20 स्वप्न के समान, जब कोई जागता है, हे प्रभु परमपिता, जब तू उठेगा, तब तू उन्हें छाया के समान तुच्छ जानेगा।
21 जब मेरा मन कड़वा हो गया था, और मेरा हृदय भीतर ही भीतर छिद गया था, 22 तब मैं मूढ़ और अज्ञान था; मैं तेरे सम्मुख पशु के समान था। 23 तौभी मैं निरन्तर तेरे संग हूँ; तू ने मेरे दाहिने हाथ को थाम रखा है। 24 तू अपनी सम्मति से मेरी अगुवाई करता है, और बाद में तू मुझे महिमा में ले लेगा। 25 स्वर्ग में मेरा और कौन है तेरे सिवा? और पृथ्वी पर तुझे छोड़ मैं और किसी को नहीं चाहता। 26 मेरा शरीर और मेरा हृदय दोनों क्षीण हो जाएँ, परन्तु हमारे परमपिता ही बल हैं मेरे हृदय के, और सदा के लिये मेरा भाग हैं।
27 क्योंकि जो तुझ से दूर रहते हैं वे नाश हो जाएँगे; जो कोई तुझ से विश्वासघात करता है उसका तू अन्त कर देता है। 28 परन्तु मेरे लिये तो हमारे परमपिता के समीप रहना ही भला है; मैं ने प्रभु परमपिता को अपना शरणस्थान बना लिया है, ताकि मैं तेरे सब कामों का वर्णन करूँ।