मेरी चट्टान, मेरा शरणस्थान
दाऊद का भजन।
144 1 धन्य है मेरे परमपिता, मेरी चट्टान, जो मेरे हाथों को युद्ध के लिये सिखाते हैं, और मेरी उंगलियों को लड़ाई के लिये— 2 मेरी करुणा और मेरा गढ़, मेरा ऊँचा गढ़ और मेरा छुड़ानेवाला, मेरी ढाल, जिसमें मैं शरण लेता हूँ, जो देश-देश के लोगों को मेरे वश में कर देते हैं।
3 हे मेरे परमपिता, मनुष्य क्या है कि तू उसकी सुधि लेता है, आदमी का पुत्र क्या है कि तू उस पर ध्यान देता है? 4 मनुष्य तो साँस के समान है; उसके दिन ढलती हुई छाया के समान हैं।
5 हे मेरे परमपिता, अपने स्वर्ग को झुकाकर उतर आ; पहाड़ों को छू, तब उनसे धुआँ उठेगा। 6 अपनी बिजली चमकाकर उन्हें तितर-बितर कर; अपने तीर चलाकर उन्हें खदेड़ दे। 7 ऊपर से अपना हाथ बढ़ा; मुझे बचा और गहरे जल से मुझे छुड़ा, परदेशियों के हाथ से, 8 जिनके मुँह झूठ बोलते हैं और जिनका दाहिना हाथ झूठी शपथ खाता है।
9 हे मेरे परमपिता, मैं तेरे लिये नया गीत गाऊँगा; दस तार वाली सारंगी पर मैं तेरा भजन गाऊँगा, 10 उसी को, जो राजाओं को विजय देता है, जो अपने दास दाऊद को क्रूर तलवार से छुड़ाता है।
11 मुझे बचा और परदेशियों के हाथ से मुझे छुड़ा, जिनके मुँह झूठ बोलते हैं और जिनका दाहिना हाथ झूठी शपथ खाता है।
12 तब हमारे बेटे उन पौधों के समान होंगे जो अपनी जवानी में बढ़े हों, हमारी बेटियाँ उन कोनेवाले खंभों के समान हों जो महल के लिये गढ़े गए हों। 13 हमारे खत्ते भरे रहेंगे, और हर प्रकार की उपज देते रहेंगे; हमारी भेड़-बकरियाँ हजारों में, वरन हमारे मैदानों में लाखों में बढ़ेंगी; 14 हमारे पशु गाभिन रहेंगे, न शहरपनाह में कोई सेंध लगेगी, न कोई बन्धुआई में जाएगा, और न हमारी सड़कों में कोई दुहाई सुनाई देगी। 15 धन्य वे लोग हैं जिनकी ऐसी दशा है; धन्य वे लोग हैं जिनके अपने हमारे परमपिता हैं।