दो मार्ग, दो गंतव्य
1 1 धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों की सम्मति पर नहीं चलता, न पापियों के बीच खड़ा होता है, और न ठट्ठा करनेवालों की मंडली में बैठता है। 2 परन्तु उसका आनन्द हमारे परमपिता की व्यवस्था में है, और वह दिन-रात उसी की व्यवस्था पर मनन करता रहता है। 3 वह उस वृक्ष के समान है जो जल की धाराओं के किनारे लगाया गया हो, जो अपनी ऋतु में फल लाता है, और जिसका पत्ता कभी नहीं मुरझाता — और जो कुछ वह करता है उसमें सफल होता है।
4 दुष्ट ऐसे नहीं! वे तो भूसे के समान हैं जिसे पवन उड़ा ले जाती है। 5 इस कारण दुष्ट न्याय में स्थिर न रह सकेंगे, और न पापी धर्मियों की मंडली में। 6 क्योंकि हमारे परमपिता धर्मियों के मार्ग की देखभाल करते हैं, परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा।