पिता की आज्ञाएँ, पुत्र का जीवन
3 1हे मेरे पुत्र, मेरी शिक्षा को न भूलना, परन्तु तेरा मन मेरी आज्ञाओं को माने, 2क्योंकि वे तेरी आयु के दिनों को बढ़ाएँगी, और जीवन तथा शान्ति के वर्षों को। 3वाचा का प्रेम और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएँ; उन्हें अपने गले में बाँध लेना, और अपने हृदय की पटिया पर लिख लेना। 4इस प्रकार तू हमारे परमपिता की और मनुष्यों की दृष्टि में अनुग्रह और अच्छी साख पाएगा।
5अपने सारे मन से हमारे परमपिता पर भरोसा रख, और अपनी ही समझ का सहारा न ले। 6अपने सब मार्गों में उसे पहचान, और वह तेरे रास्तों को सीधा करेगा।
7अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न बनना; हमारे परमपिता का भय मानना, और बुराई से दूर रहना। 8इससे तेरी देह को चंगाई और तेरी हड्डियों को ताज़गी मिलेगी।
9अपने धन से हमारे परमपिता का आदर कर, और अपनी सारी उपज के पहले फलों से, a a v9 पहले फल फसल का पहला और उत्तम भाग थे, जो उसके किसी भी उपयोग से पहले हमारे परमपिता को अर्पित किए जाते थे। 10तब तेरे खत्ते अन्न से भर जाएँगे, और तेरे कुण्ड नये दाखरस से उमड़ने लगेंगे।
11हे मेरे पुत्र, हमारे परमपिता की ताड़ना को तुच्छ न जानना और न उसकी डाँट से उकताना, 12क्योंकि हमारे परमपिता जिस से हृदय से प्रेम रखते हैं, उसी को ताड़ते हैं, जैसे पिता उस पुत्र को ताड़ता है जिस से वह प्रसन्न रहता है।
13धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाता है, और वह जो समझ प्राप्त करता है, 14क्योंकि उससे होनेवाला लाभ चाँदी के लाभ से उत्तम है, और उसका फल कुन्दन से भी बढ़कर है। 15वह मणियों से भी अधिक अनमोल है, और जो कुछ तू चाहता है उसमें से कोई भी उसकी तुलना नहीं कर सकता। 16उसके दाहिने हाथ में लम्बी आयु है; उसके बाएँ हाथ में धन और आदर हैं। 17उसके मार्ग मनभावने हैं, और उसके सब रास्ते शान्ति के हैं। 18जो उसे थाम लेते हैं उनके लिए वह जीवन का वृक्ष है; और जो उसे दृढ़ता से पकड़े रहते हैं वे धन्य कहलाते हैं।
19हमारे परमपिता ने बुद्धि के द्वारा पृथ्वी की नींव डाली; समझ के द्वारा आकाश को स्थिर किया; 20उसके ज्ञान के द्वारा गहरे सागर फूट निकले, और बादल ओस बरसाते हैं।
21हे मेरे पुत्र, इन्हें अपनी दृष्टि से ओझल न होने देना; खरी बुद्धि और विवेक को थामे रहना, 22तब वे तेरे प्राण के लिए जीवन, और तेरे गले के लिए शोभा ठहरेंगे। 23तब तू निडर होकर अपने मार्ग पर चलेगा, और तेरे पाँव में ठोकर न लगेगी। 24जब तू लेटेगा, तब तुझे भय न होगा; और जब तू लेटेगा, तब तेरी नींद मीठी होगी। 25अचानक आनेवाले आतंक से न डरना, और न दुष्टों के विनाश से जब वह आ पड़े, 26क्योंकि हमारे परमपिता तेरा आसरा ठहरेंगे, और तेरे पाँव को फँदे में फँसने से बचाएँगे।
27जिनका भला करना उचित है, उनका भला करने से पीछे न हटना, जब उसे करना तेरे हाथ में हो। 28अपने पड़ोसी से यह न कहना, “जा, और फिर आना, कल मैं तुझे दूँगा”—जबकि वह तेरे पास हो। 29अपने पड़ोसी के विरुद्ध बुराई की युक्ति न करना, जो तेरे पास भरोसे से रहता है। 30बिना कारण किसी से झगड़ा न करना, जब उसने तेरी कोई हानि न की हो।
31उपद्रवी मनुष्य से डाह न करना, और न उसके किसी मार्ग को चुनना, 32क्योंकि टेढ़ा मनुष्य हमारे परमपिता के लिए घृणित है, परन्तु सीधे लोगों को वह अपने भेद का भागी बनाते हैं। 33दुष्टों के घर पर हमारे परमपिता का श्राप रहता है, परन्तु वह धर्मियों के निवास को आशीष देते हैं। 34ठट्ठा करनेवालों की ओर वह ठट्ठा करते हैं, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करते हैं। 35बुद्धिमान आदर के भागी होंगे, परन्तु मूर्खों को केवल अपमान ही मिलता है।