हमारे परमपिता का दीपक
20 1दाखमधु ठट्ठा करनेवाला है, और मदिरा हल्ला मचानेवाली; जो कोई इसके कारण डगमगाता है, वह बुद्धिमान नहीं। 2राजा का भय सिंह की गरज के समान है; जो कोई उसे क्रोधित करता है, वह अपने ही प्राण का घातक ठहरता है। 3झगड़े से दूर रहना मनुष्य की महिमा है, परन्तु हर मूर्ख झगड़ने को तत्पर रहता है। 4आलसी मनुष्य पतझड़ में हल नहीं जोतता; इसलिए कटनी के समय वह फसल ढूँढ़ता है, पर कुछ नहीं पाता। 5मनुष्य के मन के मनसूबे गहरे जल के समान हैं, परन्तु समझवाला मनुष्य उन्हें उलीच लेता है। 6बहुत से मनुष्य अपनी-अपनी करुणा का ढिंढोरा पीटते हैं, परन्तु विश्वासयोग्य जन को कौन पा सकता है? 7धर्मी अपनी खराई में चलता रहता है; उसके बाद उसके बच्चे धन्य होते हैं! 8न्याय के सिंहासन पर विराजमान राजा अपनी दृष्टि से सारी बुराई को फटक देता है। 9कौन कह सकता है, “मैंने अपना मन शुद्ध रखा है; मैं अपने पाप से निर्मल हो गया हूँ”? 10घटते-बढ़ते बटखरे और घटते-बढ़ते नाप—इन दोनों से हमारे परमपिता घृणा करते हैं। 11बालक तक अपने कामों से पहचाना जाता है, कि उसका चालचलन शुद्ध और सीधा है या नहीं। 12सुननेवाला कान और देखनेवाली आँख—इन दोनों को हमारे परमपिता ने बनाया है। 13नींद से प्रीति न रख, नहीं तो तू कंगाल हो जाएगा; अपनी आँखें खोल, और तू रोटी से तृप्त होगा। 14मोल लेनेवाला कहता है, “निकम्मी है, निकम्मी!”—फिर चला जाता है और अपने सौदे पर डींग मारता है। 15सोना और बहुत से रत्न तो हैं, परन्तु ज्ञान बोलनेवाले होंठ दुर्लभ खज़ाना हैं। 16जो परदेशी का जामिन हो, उसका वस्त्र ले ले; और जब वह अनजानों के लिए ऐसा करे, तो उसे बन्धक रख। 17छल से कमाई हुई रोटी मीठी लगती है, परन्तु बाद में मुँह कंकड़ों से भर जाता है। 18योजनाएँ सम्मति से स्थिर होती हैं; इसलिए युद्ध बुद्धिमानी की अगुवाई से ही करना। 19चुगलखोर भेद प्रकट कर देता है; इसलिए बकवादी के संग न रह। 20जो कोई अपने माता या पिता को श्राप देता है—उसका दीपक घोर अंधकार में बुझा दिया जाएगा। 21आरम्भ में शीघ्रता से पाई हुई मीरास अन्त में धन्य न होगी। 22यह न कहना, “मैं बुराई का बदला बुराई से चुकाऊँगा।” हमारे परमपिता की बाट जोहना, और वे तुझे छुड़ाएँगे। 23घटते-बढ़ते बटखरों से हमारे परमपिता घृणा करते हैं, और छल का तराजू भला नहीं है। 24मनुष्य के डग हमारे परमपिता की ओर से निर्देशित होते हैं; फिर मनुष्य अपना मार्ग कैसे समझ सकता है? 25बिना सोचे-समझे किसी वस्तु को समर्पित कर देना और बाद में मन्नत पर फिर से विचार करना फंदा है। 26बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटक देता है और उन पर दाँवने का पहिया चला देता है। 27मनुष्य की आत्मा हमारे परमपिता का दीपक है, जो अन्तःकरण के हर कोने को टटोलता है। 28करुणा और सच्चाई राजा की रक्षा करती हैं; करुणा ही से उसका सिंहासन सम्भाला जाता है। 29जवानों की शोभा उनका बल है, परन्तु बूढ़ों का सौन्दर्य उनके पके बाल हैं। 30चोट पहुँचानेवाले घाव बुराई को माँज डालते हैं, और मार अन्तःकरण को शुद्ध कर देती है।