सही तौल उनका आनन्द है
11 1छल के तराजू से हमारे परमपिता घृणा करते हैं, परन्तु सही तौल से वे प्रसन्न होते हैं। 2जब अभिमान आता है, तब अनादर भी आता है, परन्तु बुद्धि नम्र लोगों के संग रहती है। 3सीधे लोगों की खराई उनकी अगुवाई करती है, परन्तु विश्वासघातियों की टेढ़ी चाल उनका नाश कर देती है। 4कोप के दिन धन कुछ काम नहीं आता, परन्तु धार्मिकता मृत्यु से बचाती है। 5निर्दोष की धार्मिकता उसका मार्ग सीधा करती है, परन्तु दुष्ट अपनी ही दुष्टता से गिर जाता है। 6सीधे लोगों की धार्मिकता उन्हें बचाती है, परन्तु विश्वासघाती अपनी ही लालसा में फँस जाते हैं। 7जब दुष्ट मनुष्य मरता है, तब उसकी आशा नष्ट हो जाती है, और अपने बल पर उसका भरोसा व्यर्थ हो जाता है। 8धर्मी संकट से छुड़ाया जाता है, और उसके स्थान पर दुष्ट उसमें आ पड़ता है। 9भक्तिहीन मनुष्य अपने मुँह से अपने पड़ोसी का नाश करता है, परन्तु ज्ञान के द्वारा धर्मी लोग छुड़ाए जाते हैं। 10जब धर्मियों का भला होता है, तब नगर आनन्दित होता है, और जब दुष्ट नष्ट होते हैं, तब जयजयकार होता है। 11सीधे लोगों की आशीष से नगर की उन्नति होती है, परन्तु दुष्टों के मुँह से वह ढाया जाता है। 12जो अपने पड़ोसी को तुच्छ जानता है वह निर्बुद्धि है, परन्तु समझदार मनुष्य चुप रहता है। 13लुतरा फिरता हुआ भेद प्रगट करता है, परन्तु विश्वासयोग्य आत्मा का मनुष्य भेद को छिपा रखता है। 14जहाँ अगुवाई नहीं वहाँ प्रजा गिर जाती है, परन्तु सम्मति देनेवालों की बहुतायत में सुरक्षा है। 15जो पराए के लिये जामिन होता है वह निश्चय दुःख उठाता है, परन्तु जो हाथ पर हाथ मार बचन देने से घृणा करता है वह सुरक्षित रहता है। 16अनुग्रहमयी स्त्री आदर पाती है, और निर्दयी पुरुष धन कमाते हैं। 17दयालु मनुष्य अपनी ही भलाई करता है, परन्तु क्रूर मनुष्य अपने ऊपर विपत्ति लाता है। 18दुष्ट धोखे की मजदूरी कमाता है, परन्तु जो धार्मिकता बोता है वह सच्चा प्रतिफल पाता है। 19जो धार्मिकता में स्थिर रहता है वह जीवन पाता है, परन्तु जो बुराई के पीछे दौड़ता है वह अपनी ही मृत्यु की ओर भागता है। 20टेढ़े मनवाले लोगों से हमारे परमपिता घृणा करते हैं, परन्तु जिनकी चाल निर्दोष है उनसे वे प्रसन्न होते हैं। 21निश्चय जान लो कि दुष्ट मनुष्य निर्दण्ड न छूटेगा, परन्तु धर्मियों की सन्तान बच निकलेगी। 22जैसे सूअर की नाक में सोने का छल्ला, वैसे ही वह सुन्दर स्त्री है जो विवेक नहीं दिखाती। 23धर्मियों की अभिलाषा का अन्त केवल भलाई में होता है, परन्तु दुष्टों की आशा का अन्त कोप में होता है। 24कोई मुक्त हाथ से देता है, फिर भी अधिक धनी होता जाता है; और कोई उचित से भी हाथ रोकता है, तौभी घटी में पड़ जाता है। 25उदार मन धनवान किया जाएगा, और जो दूसरों को तृप्त करता है वह स्वयं भी तृप्त किया जाएगा। 26जो अन्न को रोक रखता है उसे लोग शाप देते हैं, परन्तु जो उसे बेचता है उस पर आशीष होती है। 27जो यत्न से भलाई ढूँढ़ता है वह अनुग्रह पाता है, परन्तु जो बुराई की खोज करता है, बुराई उसी पर आ पड़ती है। 28जो अपने धन पर भरोसा रखता है वह गिर जाएगा, परन्तु धर्मी हरे पत्तों के समान लहलहाएँगे। 29जो अपने घराने को कष्ट देता है वह वायु का अधिकारी होगा, और मूर्ख बुद्धिमान मन के मनुष्य का दास होगा। 30धर्मी का फल जीवन का वृक्ष है, और जो प्राणों को जीत लेता है वह बुद्धिमान है। 31जब धर्मी को पृथ्वी पर बदला मिलता है, तो दुष्ट और पापी को कितना अधिक न मिलेगा!