परमपिता बहत्तर जनों को भेजता है
10 1इसके बाद, प्रभु ने और बहत्तर जनों को नियुक्त किया, और उन्हें दो-दो करके अपने आगे हर उस नगर और स्थान में भेजा जहाँ वह स्वयं जाने को था।
2उसने उनसे कहा, “पक्की खेती तो बहुत है, पर मजदूर थोड़े हैं। इसलिए खेत के परमपिता से बिनती करो कि वह अपनी खेती में मजदूर भेज दे। 3जाओ! देखो, मैं तुम्हें भेड़ के बच्चों के समान भेड़ियों के बीच भेजता हूँ। 4न बटुआ लेकर जाना, न झोली, न जूती, और मार्ग में किसी को नमस्कार न करना। 5जिस किसी घर में तुम प्रवेश करो, पहले यह कहना, ‘इस घर पर शान्ति हो।’ 6यदि वहाँ शान्ति का कोई जन हो, तो तुम्हारी शान्ति उस पर ठहरेगी; और यदि नहीं, तो वह तुम्हारे पास लौट आएगी। 7उसी घर में रहना, और जो कुछ वे दें उसे खाते-पीते रहना, क्योंकि मजदूर अपनी मजदूरी का हकदार है। घर-घर न फिरना। 8जब कभी तुम किसी नगर में प्रवेश करो और वे तुम्हारा स्वागत करें, तो जो कुछ तुम्हारे सामने रखा जाए, उसे खाना। 9वहाँ के रोगियों को चंगा करना और उनसे कहना, ‘हमारे पिता का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुँचा है।’ 10परन्तु जब तुम किसी ऐसे नगर में प्रवेश करो जो तुम्हारा स्वागत न करे, तो उसकी सड़कों पर निकलकर कहना, 11‘तुम्हारे नगर की जो धूल हमारे पाँवों में लगी है, उसे भी हम तुम्हारे विरुद्ध झाड़ देते हैं। फिर भी यह जान लो: हमारे पिता का राज्य निकट आ पहुँचा है।’ 12मैं तुमसे कहता हूँ, उस दिन उस नगर की दशा से सदोम की दशा अधिक सहने योग्य होगी।
13“हे खुराजीन, तुझ पर हाय! हे बैतसैदा, तुझ पर हाय! जो सामर्थ्य के काम तुम में किए गए, यदि वे सोर और सैदा में किए जाते, तो वे कब के टाट ओढ़कर और राख में बैठकर मन फिरा चुके होते। 14पर न्याय के दिन तुम्हारी दशा से सोर और सैदा की दशा अधिक सहने योग्य होगी। 15और हे कफरनहूम, क्या तू स्वर्ग तक ऊँचा किया जाएगा? तू तो अधोलोक तक नीचे गिराया जाएगा। 16जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है; और जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है; और जो मुझे तुच्छ जानता है, वह मेरे भेजनेवाले को तुच्छ जानता है।”
17उन बहत्तर जनों ने आनन्द के साथ लौटकर कहा, “हे प्रभु, तेरे नाम से दुष्टात्माएँ भी हमारे वश में हैं।”
18उसने उनसे कहा, “मैंने शैतान को बिजली के समान स्वर्ग से गिरते हुए देखा। 19देखो, मैंने तुम्हें साँपों और बिच्छुओं को रौंदने का, और शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है—और कोई वस्तु तुम्हें हानि न पहुँचाएगी। 20फिर भी इस बात से आनन्दित न हो कि आत्माएँ तुम्हारे वश में हैं—पर इससे आनन्दित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हैं।”
21उसी घड़ी यीशु पवित्र आत्मा में आनन्दित होकर बोला, “हे परमपिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरी स्तुति करता हूँ—तूने इन बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा रखा, और बालकों पर प्रकट किया। हाँ, हे परमपिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा।”
22“सब कुछ मेरे परमपिता की ओर से मुझे सौंपा गया है। कोई नहीं जानता कि पुत्र कौन है, केवल परमपिता; और यह भी कोई नहीं जानता कि परमपिता कौन है, केवल पुत्र—और वह जिस पर पुत्र उसे प्रकट करना चाहे।”
23फिर चेलों की ओर मुड़कर उसने एकान्त में कहा, “धन्य हैं वे आँखें जो देखती हैं जो तुम देखते हो! 24क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि बहुत से भविष्यद्वक्ताओं और राजाओं ने चाहा कि जो तुम देखते हो उसे देखें, पर न देख पाए; और जो तुम सुनते हो उसे सुनें, पर न सुन पाए।”
भले सामरी का दृष्टान्त
25एक व्यवस्थापक ने खड़े होकर उसकी परीक्षा करते हुए कहा, “हे गुरु, अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए मैं क्या करूँ?”
26उसने उससे कहा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू उसे कैसे पढ़ता है?”
27उसने उत्तर दिया, “तू अपने परमपिता से अपने सारे मन, अपने सारे प्राण, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।”
28उसने उससे कहा, “तूने ठीक उत्तर दिया। यही कर, तो तू जीवित रहेगा।”
29पर उसने अपने आप को धर्मी ठहराना चाहकर यीशु से पूछा, “और मेरा पड़ोसी कौन है?”
30यीशु ने कहा, “एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था, और डाकुओं के हाथ पड़ गया, जिन्होंने उसके कपड़े उतार लिए और उसे मार-पीटकर अधमरा छोड़कर चले गए। 31अब संयोग से एक याजक उसी मार्ग से जा रहा था; उसे देखकर वह कतराकर दूसरी ओर से निकल गया। 32इसी प्रकार एक लेवीय भी उस स्थान पर आया, और उसे देखकर कतराकर दूसरी ओर से निकल गया। 33परन्तु एक सामरी जो उसी मार्ग से यात्रा कर रहा था, वहाँ पहुँचा, और उसे देखकर उस पर तरस खाया। 34उसने उसके पास जाकर उसके घावों पर तेल और दाखरस डालकर उन्हें बाँधा, और अपने ही पशु पर बिठाकर उसे एक सराय में ले गया और उसकी देखभाल की। 35दूसरे दिन उसने दो चाँदी के सिक्के निकालकर सराय के रखवाले को दिए और कहा, ‘इसकी देखभाल करना, और जो कुछ अधिक खर्च हो, उसे मैं लौटने पर चुका दूँगा।’ 36अब तेरी समझ में इन तीनों में से कौन उस मनुष्य का पड़ोसी ठहरा जो डाकुओं के हाथ पड़ा था?”
37उसने कहा, “वही जिसने उस पर दया की।” यीशु ने उससे कहा, “जा, और तू भी वैसा ही कर।”
मारथा और मरियम
38जब वे जा रहे थे, तो यीशु एक गाँव में गया। मारथा नाम की एक स्त्री ने उसका अपने घर में स्वागत किया। 39उसकी मरियम नाम की एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठकर उसका वचन सुनती रही। 40पर मारथा सेवा-टहल के बहुत काम में उलझी हुई थी। उसने उसके पास आकर कहा, “हे प्रभु, क्या तुझे इसकी चिन्ता नहीं कि मेरी बहन ने सेवा का सारा काम मुझ अकेली पर छोड़ दिया है? उससे कह कि वह मेरी सहायता करे।”
41पर प्रभु ने उसे उत्तर दिया, “मारथा, हे मारथा, तू बहुत बातों के लिए चिन्ता करती और घबराती है, 42पर एक ही बात की आवश्यकता है। मरियम ने वह उत्तम भाग चुन लिया है, जो उससे छीना न जाएगा।”