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अय्यूब 29 FHB पिता के हृदय की बाइबिल™

पितायीशुआत्मा
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पुस्तक

अय्यूब एक बार फिर बोलता है

अय्यूब याद करता है कि उसने क्या खोया है: अपने चारों ओर अपने बच्चे, अपने डेरे पर परमेश्वर की मित्रता, पूरे नगर का आदर। वह अंधों के लिए आँखें और ज़रूरतमंदों के लिए पिता था, और उम्मीद करता था कि अपने घोंसले में बूढ़ा होकर मरेगा, उसकी महिमा ताज़ा रहेगी।

अध्याय 29।

और अय्यूब ने फिर कहना आरम्भ किया और कहा: “भला होता कि मैं बीते हुए महीनों के समान होता, उन दिनों के समान जब परमेश्वर मेरी रक्षा करता था, जब उसका दीपक मेरे सिर पर चमकता था, और मैं उसके प्रकाश से अन्धकार में चलता था; जैसा मैं अपनी जवानी के दिनों में था, जब परमेश्वर की घनिष्ठ मित्रता मेरे तम्बू पर बनी रहती थी, a a v4 अय्यूब उस निकटता के लिए तरसता है जो उसने कभी जानी थी — परमेश्वर की घनिष्ठ मित्रता जो उसके घर पर छाई रहती थी। वह अभी तक नहीं जानता कि जिस परमेश्वर की उसे कमी खलती है वही परमपिता है जिसका हृदय कभी उससे दूर नहीं हुआ; और यह कि पुस्तक समाप्त होने से पहले वह स्वयं उसे देख लेगा। जब सर्वशक्तिमान अब भी मेरे संग था, जब मेरे बच्चे मेरे चारों ओर थे; जब मेरे पाँव दही से नहाए रहते थे, और चट्टान मेरे लिए तेल की धाराएँ उण्डेलती थी। जब मैं नगर के फाटक को जाता और चौक में अपना आसन लगाता था, जवान मुझे देखकर हट जाते थे, और बूढ़े उठकर खड़े हो जाते थे; हाकिम बोलने से रुक जाते थे, और अपने मुँह पर हाथ रख लेते थे; प्रधानों का स्वर थम जाता था, और उनकी जीभ तालू से चिपक जाती थी। जो कान मुझे सुनता, वह मुझे धन्य कहता, और जो आँख मुझे देखती, वह मेरे पक्ष में गवाही देती थी, क्योंकि मैं दुहाई देते हुए दीन को छुड़ाता था, और उस अनाथ को भी जिसका कोई सहायक न था। नाश होनेवाले की आशीष मुझ पर आ पड़ती थी, और मैं विधवा के हृदय को आनन्द से गीत गवाता था। मैंने धार्मिकता को पहन लिया, और उसने मुझे पहन लिया; मेरा न्याय मानो बागा और पगड़ी थी। मैं अन्धों के लिए आँखें, और लँगड़ों के लिए पाँव था। मैं दरिद्रों का पिता था, और जिसको मैं नहीं जानता था उसके मुकद्दमे की भी खोज करता था। मैं दुष्ट के जबड़ों को तोड़ डालता, और उसके दाँतों से अहेर छुड़ा लेता था। इसलिए मैं सोचता था, ‘मैं अपने ही घोंसले में मरूँगा, और अपने दिनों को बालू के किनकों के समान बढ़ाऊँगा।’ मेरी जड़ें जल की ओर फैली थीं, और मेरी डालियों पर रात भर ओस पड़ी रहती थी। मेरी महिमा मुझ में ताज़ा बनी रहती थी, और मेरा धनुष मेरे हाथ में सदा नया रहता था। लोग मेरी सुनकर बाट जोहते थे; और मेरी सम्मति के लिए चुप रहते थे। मेरे बोल चुकने पर वे कुछ न कहते थे; मेरी बातें उन पर धीरे-धीरे टपकती थीं। जैसे लोग वर्षा की बाट जोहते हैं वैसे ही वे मेरी बाट जोहते थे, और अपना मुँह ऐसा खोलते थे जैसे पिछली वर्षा के लिए। जब मैं उन पर मुस्कुराता था, तब उन्हें विश्वास ही न होता था, और वे मेरे मुख के प्रकाश को थामे रहते थे। मैं उनका मार्ग चुनता और उनके प्रधान के रूप में बैठता था; मैं अपनी सेना के बीच राजा के समान रहता था, और शोक करनेवालों को शान्ति देनेवाले के समान था।”