परमपिता अपनी प्रिया को स्मरण करते हैं
2 1हमारे परमपिता का वचन मेरे पास आया:
2जा, और यरूशलेम के कानों में यह प्रचार कर: हमारे परमपिता यह कहते हैं: मुझे तेरी जवानी की भक्ति, तेरा दुल्हन जैसा प्रेम स्मरण है, कि तू जंगल में, ऐसे देश में जो बोया नहीं गया था, मेरे पीछे-पीछे चलती रही। a a v2 हमारे परमपिता इस्राएल के आरम्भिक प्रेम को कोमलता से स्मरण करते हैं, जैसे कोई दूल्हा अपनी दुल्हन को स्मरण करता है—वही वाचा की कोमलता जिसे वे फिर से स्थापित करने की लालसा रखते हैं। 3इस्राएल हमारे परमपिता के लिये पवित्र था, उनकी उपज की पहली उपज। जितनों ने उसे निगल लिया वे सब दोषी ठहरे; उन पर विपत्ति आ पड़ी, हमारे परमपिता की यही वाणी है।
4हे याकूब के घराने, और इस्राएल के घराने के सब कुलों, हमारे परमपिता का वचन सुनो।
5हमारे परमपिता यह कहते हैं: तुम्हारे पुरखाओं ने मुझ में कौन-सी बुराई पाई, कि वे मुझ से दूर हट गए, और निकम्मी मूरतों के पीछे चलकर स्वयं निकम्मे हो गए?
6उन्होंने यह भी न पूछा, ‘हमारे परमपिता कहाँ हैं, जो हमें मिस्र देश से निकाल लाए, जो हमें जंगल में से होकर ले चले, मरुभूमि और गड्ढों से भरे देश में से, सूखे और घोर अन्धकार के देश में से, ऐसे देश में से जिसमें से कोई नहीं गुज़रता और जिसमें कोई नहीं बसता?’ 7और मैं तुम्हें एक फलदायक देश में ले आया, कि तुम उसके फल और उत्तम पदार्थ खाओ। परन्तु तुमने आकर मेरे देश को अशुद्ध कर दिया, और मेरे निज भाग को घृणित बना दिया। 8याजकों ने न पूछा, ‘हमारे परमपिता कहाँ हैं?’ जो व्यवस्था के जानकार थे उन्होंने मुझे न जाना; चरवाहों ने मुझ से बलवा किया; भविष्यद्वक्ताओं ने बाल के नाम से भविष्यद्वाणी की और निकम्मी वस्तुओं के पीछे चले। 9इस कारण मैं फिर भी तुम पर मुकद्दमा चलाऊँगा, हमारे परमपिता की यही वाणी है, और तुम्हारे बच्चों के बच्चों पर भी दोष लगाऊँगा। 10कित्तियों के द्वीपों में पार जाकर देखो; और केदार में दूत भेजकर ध्यान से जाँच करो; देखो, कि क्या कभी ऐसी बात हुई है: 11क्या किसी जाति ने कभी अपने देवताओं को बदला है, यद्यपि वे कोई देवता ही नहीं हैं? परन्तु मेरी प्रजा ने अपनी महिमा को निकम्मी वस्तु से बदल डाला है। 12हे आकाश, इस बात पर चकित हो; भयभीत हो, और अत्यन्त थरथरा उठ, हमारे परमपिता की यही वाणी है। 13क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयाँ की हैं: उन्होंने त्याग दिया है मुझ जीवन के जल के सोते को, और अपने लिये हौद, वरन ऐसे टूटे हुए हौद खोद लिये हैं जिनमें जल नहीं ठहरता। b b v13 हमारे परमपिता स्वयं को जीवन के जल का सोता कहते हैं; बाद में यीशु ने यही जीवन का जल उन सब को देने का वचन दिया जो उनके पास आते हैं (यूहन्ना 4:14; 7:38)।
14क्या इस्राएल दास है? क्या वह घर में जन्मा हुआ दास है? फिर वह क्यों लूट का माल बन गया है? 15जवान सिंहों ने गरजकर हुंकार भरी उस पर; उन्होंने ज़ोर से दहाड़ा। उन्होंने उसके देश को उजाड़ कर दिया; उसके नगर जल गए और निर्जन हो गए हैं। 16इसके अलावा, नोप के निवासियों ने और तहपन्हेस के लोगों ने तेरे सिर के चाँद को मूँड़ डाला है। c c v16 प्राचीन संसार में किसी का सिर मूँड़ा या नंगा किया जाना पूर्ण पराजय और अपमान का चिन्ह था। 17क्या तूने यह विपत्ति अपने ऊपर स्वयं नहीं ला ली, अपने परमपिता को त्यागकर, जो तुझे मार्ग में लिये चलते थे? 18और अब, तू मिस्र क्यों जाता है कि नील नदी का जल पीए? तू अश्शूर क्यों जाता है कि फरात नदी का जल पीए? 19तेरी अपनी बुराई तुझे ताड़ना देगी; तेरा अपना धर्मत्याग तुझे झिड़केगा। इसलिये जान ले और देख कि यह कैसी बुरी और कड़वी बात है कि अपने परमपिता को त्यागना; तुझ में मेरा भय है ही नहीं, स्वर्ग की सेनाओं के परमपिता की यही वाणी है। 20बहुत पहले मैंने तेरा जूआ तोड़ डाला और तेरे बन्धन खोल दिए, परन्तु तूने कहा, ‘मैं सेवा नहीं करूँगी।’ सचमुच, हर एक ऊँची पहाड़ी पर और हर एक हरे पेड़ के नीचे तू वेश्या के समान लेट गई। 21मैंने तो तुझे उत्तम दाखलता के समान लगाया था, बिलकुल भरोसेमन्द बीज से। फिर तू मेरे विरुद्ध होकर बिगड़ी हुई जंगली दाखलता कैसे बन गई? 22चाहे तू अपने आप को खार से धोए और बहुत सा साबुन प्रयोग करे, तौभी तेरे अधर्म का धब्बा मेरे सामने बना ही रहता है, प्रभु परमपिता की यही वाणी है।
23तू कैसे कह सकती है, ‘मैं अशुद्ध नहीं हुई; मैं बाल देवताओं के पीछे नहीं चली’? तराई में अपनी चाल को देख; सोच कि तूने क्या किया है—तू तो इधर-उधर दौड़ने वाली एक बेचैन जवान ऊँटनी है, 24तू जंगल की अभ्यस्त एक जंगली गदही है, जो अपनी कामातुरता में वायु सूँघती है—जब वह मस्ती पर होती है तब उसे कौन रोक सकता है? जो उसे चाहते हैं उन्हें स्वयं को थकाने की आवश्यकता नहीं कि खोजते फिरें; उसके ऋतु के समय वे उसे पा लेते हैं। 25अपने पाँवों को नंगे होने से पहले रोक ले और अपने गले को सूखने से पहले। परन्तु तूने कहा, ‘कोई आशा नहीं! नहीं, क्योंकि मैं परदेशियों से प्रेम रखती हूँ, और उन्हीं के पीछे चलूँगी।’ 26जैसे चोर पकड़े जाने पर लज्जित होता है, वैसे ही इस्राएल का घराना लज्जित होगा—वे, उनके राजा, उनके हाकिम, उनके याजक, और उनके भविष्यद्वक्ता, 27जो वृक्ष से कहते हैं, ‘तू मेरा पिता है,’ और पत्थर से, ‘तूने मुझे जन्म दिया।’ क्योंकि उन्होंने मुझ से पीठ फेर ली है, मुँह नहीं फेरा; परन्तु अपनी विपत्ति के समय वे पुकारते हैं, ‘उठकर हमें बचा!’ d d v27 किसी गढ़े हुए वृक्ष को ‘मेरा पिता’ कहना उस सच्चे सम्बन्ध का दुखद नकली रूप है—सच्चे परमपिता से, जिसने उन्हें बनाया, फिरकर ऐसी निर्जीव वस्तुओं की ओर मुड़ना जो ऐसा कर ही नहीं सकतीं। 28परन्तु तेरे वे देवता कहाँ हैं जिन्हें तूने अपने लिये बनाया? यदि वे तुझे तेरी विपत्ति के समय बचा सकते हैं तो वे उठें; क्योंकि हे यहूदा, जितने तेरे नगर हैं उतने ही तेरे देवता भी हैं। 29तुम मुझ पर क्यों मुकद्दमा चलाते हो? तुम सब ने मुझ से बलवा किया है, हमारे परमपिता की यही वाणी है। 30मैंने व्यर्थ ही तुम्हारे बच्चों को मारा; उन्होंने कोई ताड़ना ग्रहण न की। तुम्हारी अपनी तलवार तुम्हारे भविष्यद्वक्ताओं को निगल गई फाड़ने वाले सिंह के समान। 31हे इस पीढ़ी के लोगो, हमारे परमपिता के वचन पर ध्यान दो: क्या मैं इस्राएल के लिये जंगल बना, या घोर अन्धकार का देश? फिर मेरी प्रजा क्यों कहती है, ‘हम तो स्वतन्त्र होकर घूमते-फिरते हैं; हम फिर कभी तेरे पास न आएँगे’? 32क्या कोई युवती अपने गहने भूल सकती है, या दुल्हन अपने विवाह का पटका? परन्तु मेरी प्रजा ने भुला दिया है मुझे, अनगिनत दिनों से। 33तू प्रेम को पाने के लिये कैसी चतुराई से चालें चलती है! तूने तो दुष्ट स्त्रियों को भी अपने मार्ग सिखा दिए हैं। 34तेरे वस्त्र के आँचल में निर्दोष कंगालों का लहू पाया जाता है—यद्यपि तूने उन्हें सेंध लगाते नहीं पकड़ा था। तौभी इन सब बातों के बावजूद, 35तू कहती है, ‘मैं निर्दोष हूँ; निश्चय उनका क्रोध मुझ पर से हट गया है।’ परन्तु मैं तुझ पर न्याय लाऊँगा, क्योंकि तू कहती है, ‘मैंने पाप नहीं किया।’ 36तू कितनी लापरवाही से बार-बार अपना मार्ग बदलती रहती है! तू मिस्र से लज्जित होगी जैसे तू अश्शूर से लज्जित हुई थी। 37वहाँ से भी तू अपने सिर पर हाथ रखे हुए लौटेगी, क्योंकि हमारे परमपिता ने उन्हें त्याग दिया है जिन पर तू भरोसा रखती है, और उनसे तेरा कुछ भला न होगा।