पृथ्वी उजाड़ की जाएगी
24 1देखो—हमारे परमपिता पृथ्वी को उजाड़ कर सूनी कर देते हैं; वे उसकी सतह को उलट देते हैं और उसके निवासियों को तितर-बितर कर देते हैं। 2जैसी दशा साधारण लोगों की होगी वैसी ही याजक की; जैसी दास की वैसी ही उसके स्वामी की; जैसी दासी की वैसी ही उसकी स्वामिनी की; जैसी मोल लेनेवाले की वैसी ही बेचनेवाले की; जैसी उधार देनेवाले की वैसी ही उधार लेनेवाले की; जैसी महाजन की वैसी ही कर्ज़दार की। 3पृथ्वी पूरी तरह उजाड़ दी जाएगी और पूरी तरह लूटी जाएगी, क्योंकि हमारे परमपिता ने यह वचन कहा है।
4पृथ्वी विलाप करती और मुरझा जाती है; जगत कुम्हला जाता है और मुरझा जाता है; पृथ्वी के प्रतिष्ठित लोग भी कुम्हला जाते हैं। 5पृथ्वी अपने निवासियों के कारण अशुद्ध हो गई है, क्योंकि उन्होंने व्यवस्था का उल्लंघन किया, विधि को तोड़ा और सनातन वाचा को भंग किया है। 6इस कारण श्राप पृथ्वी को निगल जाता है, और उसमें बसनेवाले अपने दोष का बोझ उठाते हैं; इसी कारण पृथ्वी के निवासी भस्म हो जाते हैं, और थोड़े ही लोग बचे रहते हैं। 7नया दाखमधु विलाप करता है, दाखलता मुरझा जाती है; सब आनन्द मनानेवाले आहें भरते हैं। 8डफ का आनन्द थम गया है, मौज करनेवालों का कोलाहल बन्द हो गया है, वीणा का आनन्द भी थम गया है। 9अब वे गीत गाते हुए दाखमधु नहीं पीते; पीनेवालों को मदिरा कड़वी लगती है। 10गड़बड़ी का नगर ढा दिया गया है; हर एक घर ऐसा बन्द है कि उसमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता। 11सड़कों पर दाखमधु के लिये चिल्लाहट मची है; सारा हर्ष अंधकारमय हो गया है, पृथ्वी का आनन्द दूर कर दिया गया है। 12नगर में केवल उजाड़ ही रह गया है; फाटक टूटकर खण्डहर हो गया है। 13क्योंकि पृथ्वी पर ऐसा ही होगा, जातियों के बीच: जैसे जैतून का वृक्ष झाड़ लिया गया हो, जैसे दाख तोड़ लेने के बाद बचे हुए अंगूर। a a v13 जैतून के पेड़ों की फसल डालियों को पीट-पीटकर तोड़ी जाती थी—इसके बाद केवल थोड़े-से बिखरे हुए जैतून ही बचे रह जाते थे, जो उस छोटे-से बचे हुए शेष लोगों का चित्र है।
14वे अपना स्वर ऊँचा करते और आनन्द से जयजयकार करते हैं; हमारे परमपिता के प्रताप के कारण वे पश्चिम से ऊँचे शब्द से पुकारते हैं। 15इसलिये पूर्व में हमारे परमपिता की महिमा करो; समुद्र के तटों पर हमारे परमपिता, इस्राएल के परमेश्वर के नाम की महिमा करो। 16पृथ्वी की छोर से हमें गीत सुनाई देते हैं: “धर्मी की महिमा हो!” परन्तु मैंने कहा, “मैं क्षीण होता जाता हूँ, मैं क्षीण होता जाता हूँ—मुझ पर हाय! विश्वासघाती विश्वासघात करते हैं; हाँ, विश्वासघातियों ने बड़े विश्वासघात के साथ विश्वासघात किया है।”
17हे पृथ्वी के निवासियो, आतंक और गड्ढा और फन्दा तुम पर आ पड़े हैं! 18जो कोई आतंक के शब्द से भागेगा, वह गड्ढे में गिरेगा, और जो गड्ढे में से निकलेगा, वह फन्दे में फँस जाएगा। क्योंकि आकाश की खिड़कियाँ खुल गई हैं, और पृथ्वी की नींवें डोल उठी हैं। 19पृथ्वी पूरी तरह चकनाचूर हो गई है, पृथ्वी फट गई है, पृथ्वी बड़े वेग से हिल उठी है। 20पृथ्वी मतवाले के समान लड़खड़ाती है, वह झोंपड़ी के समान झूलती है; उसका अपराध उस पर भारी हो गया है, और वह गिर पड़ेगी और फिर न उठेगी।
21उस दिन हमारे परमपिता दण्ड देंगे ऊँचाइयों पर के ऊँचाइयों के दल को, और पृथ्वी पर के पृथ्वी के राजाओं को। 22वे बन्दियों के समान इकट्ठे कर के हाँके जाएँगे, एक गड्ढे में डाले जाएँगे; वे कालकोठरी में बन्द कर दिए जाएँगे, और बहुत दिनों के बाद उन्हें दण्ड दिया जाएगा। 23तब चन्द्रमा लज्जित होगा और सूर्य को भी लज्जा आएगी, क्योंकि स्वर्गीय सेनाओं के पिता सिय्योन पर्वत पर और यरूशलेम में राज्य करते हैं, और अपने पुरनियों के सामने उनकी महिमा प्रकाशमान होती है।