विश्वास क्या है
11 1अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। 2क्योंकि इसी के कारण प्राचीन काल के लोगों की भली गवाही दी गई। 3विश्वास ही से हम समझते हैं कि हमारे परमपिता के वचन से सारी सृष्टि रची गई, कि जो कुछ दिखाई देता है वह देखी हुई वस्तुओं से नहीं बना।
4विश्वास ही से हाबिल ने हमारे परमपिता के सामने कैन से उत्तम बलिदान चढ़ाया, जिसके द्वारा वह धर्मी ठहराया गया, और हमारे परमपिता ने उसकी भेंटें ग्रहण करके उसकी गवाही दी। यद्यपि वह मर गया, तौभी अपने विश्वास के द्वारा वह अब भी बोलता है।
5विश्वास ही से हनोक उठा लिया गया, कि मृत्यु को न देखे, और वह न मिला, क्योंकि हमारे परमपिता ने उसे उठा लिया था। उठाए जाने से पहले उसकी यह गवाही दी गई कि वह हमारे परमपिता को भाता है। 6और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना असम्भव है, क्योंकि जो कोई हमारे परमपिता के पास आता है, उसे विश्वास करना चाहिए कि वह है, और अपने सच्चे मन से खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।
7विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो अब तक दिखाई न देती थीं, चेतावनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के उद्धार के लिए एक जहाज़ बनाया। इसी के द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया और उस धार्मिकता का वारिस हुआ जो विश्वास से मिलती है।
8विश्वास ही से अब्राहम ने, जब बुलाया गया, तो उस जगह जाने की आज्ञा मानी जिसे वह मीरास में पानेवाला था, और यह न जानते हुए कि कहाँ जाता है, निकल पड़ा। 9विश्वास ही से वह प्रतिज्ञा किए हुए देश में परदेशी के समान रहा, और उसी प्रतिज्ञा के सहवारिस इसहाक और याकूब के साथ तम्बुओं में रहा; 10क्योंकि वह उस नगर की बाट जोहता था जिसकी नींवें हैं, और जिसका रचनेवाला और बनानेवाला हमारे परमपिता हैं।
11विश्वास ही से सारा ने भी, यद्यपि उसकी अवस्था ढल चुकी थी, गर्भ धारण करने की सामर्थ्य पाई, क्योंकि उसने उसे विश्वासयोग्य जाना जिसने प्रतिज्ञा की थी। 12इसलिए एक ही से, वह भी मरे हुए के समान, आकाश के तारों के समान अनगिनत, और समुद्र के तट की बालू के समान असंख्य वंश उत्पन्न हुए।
13ये सब विश्वास ही में मर गए, और उन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ न मिलीं, पर उन्हें दूर ही से देखकर आनन्दित हुए, और मान लिया कि हम पृथ्वी पर परदेशी और यात्री हैं। 14जो ऐसी बातें कहते हैं, वे प्रगट करते हैं कि वे अपने किसी देश की खोज में हैं। 15और यदि वे उस देश की सुधि करते जिसे छोड़ आए थे, तो उन्हें लौट जाने का अवसर मिलता। 16पर वे तो इससे उत्तम, अर्थात् स्वर्गीय देश की लालसा करते हैं। इसी कारण हमारे परमपिता उनका पिता कहलाने में लज्जित नहीं होते, क्योंकि उन्होंने उनके लिए एक नगर तैयार किया है। a a v16 इब्रानियों की यह पत्री पुराने नियम की वाचा-वाणी को दोहराती है — ‘मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे’ — जिसे हमारे परमपिता ने सदा परिवार की भाषा में समझा: ‘मैं उनका पिता ठहरूँगा, और वे मेरी सन्तान ठहरेंगे।’ वह इस परिवार के नाम से लज्जित नहीं होते।
17विश्वास ही से अब्राहम ने, जब उसकी परीक्षा हुई, तो इसहाक को बलिदान चढ़ाया; हाँ, जिसने प्रतिज्ञाएँ पाई थीं, वह अपने एकलौते पुत्र को चढ़ाने लगा,
18जिसके विषय में कहा गया था, “इसहाक ही से तेरा वंश कहलाएगा।”
19उसने सोचा कि हमारे परमपिता सामर्थी हैं कि मरे हुओं में से भी जिलाएँ; और दृष्टान्त के रूप में उसने उसे वहाँ से पाया भी।
20विश्वास ही से इसहाक ने याकूब और एसाव को आनेवाली बातों के विषय में आशीर्वाद दिया।
21विश्वास ही से याकूब ने मरते समय यूसुफ के दोनों पुत्रों को आशीर्वाद दिया, और अपनी लाठी के सिरे पर टेककर दण्डवत् किया।
22विश्वास ही से यूसुफ ने मरते समय इस्राएलियों के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी।
23विश्वास ही से मूसा के माता-पिता ने उसके जन्म के बाद उसे तीन महीने तक छिपा रखा, क्योंकि उन्होंने देखा कि बालक सुन्दर है, और वे राजा की आज्ञा से न डरे।
24विश्वास ही से मूसा ने बड़े होने पर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया, 25और उसने पाप के थोड़े दिन के सुख भोगने की अपेक्षा हमारे परमपिता की प्रजा के साथ दुःख भोगना अधिक अच्छा जाना। 26उसने मसीह के कारण मिली निन्दा को मिस्र के भण्डारों से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी दृष्टि प्रतिफल की ओर लगी थी। 27विश्वास ही से उसने राजा के क्रोध से न डरकर मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे हमारे परमपिता को मानो देखता हुआ धीरज धरे रहा। 28विश्वास ही से उसने फसह और लहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहलौठों का नाश करनेवाला उन्हें न छू सके।
29विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए जैसे सूखी भूमि पर; और जब मिस्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो निगल लिए गए।
30विश्वास ही से यरीहो की शहरपनाह, जब सात दिन तक उसकी परिक्रमा की गई, गिर पड़ी।
31विश्वास ही से राहाब वेश्या आज्ञा न माननेवालों के साथ नाश न हुई, क्योंकि उसने भेदियों को कुशल से रख लिया था।
32अब मैं और क्या कहूँ? क्योंकि गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिफ्तह, दाऊद और शमूएल और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूँ, तो समय थोड़ा पड़ जाएगा; 33इन्होंने विश्वास ही के द्वारा राज्यों को जीता, धार्मिकता के काम किए, प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ पाईं, सिंहों के मुँह बन्द किए, 34आग की ज्वाला को बुझाया, तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवन्त हुए, युद्ध में पराक्रमी बने, और परदेशियों की फ़ौजों को मार भगाया। 35स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को पुनरुत्थान के द्वारा फिर पाया; और औरों ने छुटकारे को स्वीकार न करके यातनाएँ सहीं, कि उन्हें उत्तम पुनरुत्थान मिले। 36औरों ने ठट्ठों में उड़ाए जाने और कोड़े खाने का, वरन बेड़ियों और कैद का भी दुःख उठाया। 37वे पत्थरवाह किए गए, आरे से चीरे गए, तलवार से मारे गए; वे भेड़ों और बकरियों की खालें ओढ़े हुए मारे-मारे फिरते रहे, दीन-दुःखी और सताए हुए— 38संसार उनके योग्य न था—वे जंगलों, पहाड़ों, गुफाओं और धरती की दरारों में भटकते फिरे।
39और इन सब ने यद्यपि विश्वास के कारण भली गवाही पाई, तौभी प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न पाई, 40क्योंकि हमारे परमपिता ने हमारे लिए कोई उत्तम बात पहले से ठहराई थी, कि वे हमारे बिना सिद्ध न ठहरें।