मधु के समान मीठी पुस्तक
3 1उन्होंने मुझ से कहा, “हे मनुष्य के पुत्र, जो तुझे मिले उसे खा। इस पुस्तक को खा, फिर जाकर इस्राएल के घराने से बातें कर।”
2तब मैंने अपना मुँह खोला, और उन्होंने वह पुस्तक मुझे खिला दी।
3उन्होंने मुझ से कहा, “हे मनुष्य के पुत्र, इस पुस्तक से जो मैं तुझे देता हूँ अपना पेट भर और अपनी अन्तड़ियाँ तृप्त कर।” तब मैंने उसे खाया, और वह मेरे मुँह में मधु के समान मीठी लगी।
4फिर उन्होंने मुझ से कहा, “हे मनुष्य के पुत्र, इस्राएल के घराने के पास जा और मेरे वचन उन से कह।
5क्योंकि तू किसी अनजानी बोली और कठिन भाषा वाली जाति के पास नहीं, वरन इस्राएल के घराने के पास भेजा जाता है, 6न बहुत सी अनजानी बोली और कठिन भाषा वाली जातियों के पास, जिनके वचन तू समझ न सके। निश्चय ही, यदि मैं तुझे उनके पास भेजता, तो वे तेरी सुनतीं। 7परन्तु इस्राएल का घराना तेरी सुनने को तैयार न होगा, क्योंकि वे मेरी ही सुनने को तैयार नहीं; क्योंकि सारा इस्राएल का घराना हठीले माथे और कठोर मन का है। 8देख, मैंने तेरा मुख उनके मुख के समान कठोर, और तेरा माथा उनके माथे के समान कठोर बना दिया है। 9मैंने तेरा माथा हीरे के समान, चकमक पत्थर से भी कठोर बना दिया है। तू उन से न डरना और न उनके मुख देखकर घबराना, क्योंकि वे विद्रोही घराना हैं।”
10उन्होंने मुझ से कहा, “हे मनुष्य के पुत्र, जितने वचन मैं तुझ से कहूँ उन सभों को अपने मन में ग्रहण कर और अपने कानों से सुन। 11जा, बन्धुआई में पड़े हुए अपने ही लोगों के पास जा और उन से बातें कर। उन से कह, ‘प्रभु परमपिता यों कहते हैं,’ चाहे वे सुनें या न सुनें।”
12तब हमारे पिता के आत्मा ने मुझे उठा लिया, और मैंने अपने पीछे बड़ी गड़गड़ाहट का शब्द सुना: “अपने निवासस्थान से हमारे परमपिता की महिमा धन्य हो!” 13और जीवधारियों के पंखों का शब्द जो एक दूसरे से टकराते थे, और उनके पास के पहियों का शब्द, अर्थात बड़ी गड़गड़ाहट का शब्द। 14आत्मा ने मुझे उठाकर ले लिया, और मैं कड़वाहट में, अपनी आत्मा में जलता हुआ चला गया, और हमारे परमपिता का हाथ मुझ पर भारी बना रहा। 15मैं कबार नदी के तीर पर तेल-अबीब में बन्धुआई में पड़े हुए लोगों के पास आया, और वहाँ जहाँ वे बसे थे मैं सात दिन तक स्तब्ध होकर उनके बीच बैठा रहा।
परमपिता एक पहरुआ नियुक्त करते हैं
16सात दिन के बाद हमारे परमपिता का वचन मेरे पास पहुँचा:
17“हे मनुष्य के पुत्र, मैंने तुझे इस्राएल के घराने के लिये पहरुआ ठहराया है। जब कभी तू मेरे मुँह से कोई वचन सुने, तब मेरी ओर से उन्हें चिताना। 18जब मैं दुष्ट से कहूँ, ‘तू निश्चय मरेगा,’ और तू उसे न चिताए, और न दुष्ट को उसकी दुष्ट चाल से चिताने को कुछ कहे कि उसका प्राण बचे, तो वह दुष्ट अपने अधर्म में मरेगा, परन्तु मैं तुझ से उसके खून का लेखा लूँगा।
19परन्तु यदि तू दुष्ट को चिताए, और वह अपनी बुराई और अपनी दुष्ट चाल से न फिरे, तो वह अपने अधर्म में मरेगा, परन्तु तू ने अपना प्राण बचा लिया होगा।
20फिर जब कोई धर्मी अपनी धार्मिकता से फिरकर कुटिलता करे, और मैं उसके सामने ठोकर रखूँ, तो वह मरेगा। इसलिये कि तू ने उसे न चिताया, वह अपने पाप में मरेगा, और जो धर्म के काम उस ने किए थे उनका स्मरण न किया जाएगा, परन्तु मैं तुझ से उसके खून का लेखा लूँगा। 21परन्तु यदि तू धर्मी को चिताए कि वह पाप न करे, और वह पाप न करे, तो वह निश्चय जीवित रहेगा, क्योंकि उस ने चितौनी मानी, और तू ने अपना प्राण बचा लिया होगा।”
22वहाँ हमारे परमपिता का हाथ मुझ पर आया, और उन्होंने मुझ से कहा, “उठ, मैदान में निकल जा, और वहाँ मैं तुझ से बातें करूँगा।”
23तब मैं उठकर मैदान में गया, और वहाँ हमारे परमपिता की महिमा उस महिमा के समान खड़ी थी जिसे मैंने कबार नदी के तीर पर देखा था, और मैं मुँह के बल गिर पड़ा।
24तब आत्मा ने मुझ में समाकर मुझे पाँवों के बल खड़ा किया, और मुझ से बातें करके कहा: “जा, अपने घर के भीतर द्वार बन्द करके बैठ जा। 25और हे मनुष्य के पुत्र, देख, वे तुझ पर रस्सियाँ डालकर तुझे उन से बाँधेंगे, कि तू लोगों के बीच निकलने न पाए।
26और मैं तेरी जीभ तेरे तालू से चिपका दूँगा, जिस से तू गूँगा हो जाएगा और उन्हें डाँट न सकेगा, क्योंकि वे विद्रोही घराना हैं। 27परन्तु जब मैं तुझ से बातें करूँगा, तब तेरा मुँह खोल दूँगा, और तू उन से कहेगा, ‘प्रभु परमपिता यों कहते हैं।’ जो सुनना चाहे वह सुने; और जो न सुनना चाहे वह न सुने—क्योंकि वे विद्रोही घराना हैं।”