हमारे परमपिता की महिमा मन्दिर से विदा होती है
10 1फिर मैंने दृष्टि की: करूबों के सिरों के ऊपर के अन्तरिक्ष में नीलमणि के समान कुछ दिखाई दिया, जो सिंहासन के आकार का था।
2और हमारे परमपिता ने सन के वस्त्र पहने हुए उस पुरुष से कहा, “करूबों के नीचे घूमते हुए पहियों के बीच में जा। करूबों के बीच में से जलते हुए अंगारों से अपनी मुट्ठियाँ भरकर उन्हें नगर के ऊपर बिखेर दे।” और मेरे देखते-देखते वह भीतर गया।
3जब वह पुरुष भीतर गया, तब करूब मन्दिर के दक्षिण की ओर खड़े थे, और भीतरी आँगन बादल से भर गया। 4तब हमारे परमपिता की महिमा करूब पर से उठकर मन्दिर की डेवढ़ी पर आ गई, और मन्दिर बादल से भर गया, और आँगन हमारे परमपिता की महिमा के तेज से भर गया। 5करूबों के पंखों का शब्द बाहरी आँगन तक सुनाई देता था, मानो सर्वशक्तिमान के बोलने का शब्द हो।
6जब उसने सन के वस्त्र पहने हुए उस पुरुष को यह आज्ञा दी, “घूमते हुए पहियों के बीच में से, करूबों के बीच में से आग ले,” तब वह भीतर जाकर एक पहिये के पास खड़ा हुआ।
7तब उस करूब ने करूबों के बीच की आग की ओर अपना हाथ बढ़ाया, और कुछ आग लेकर सन के वस्त्र पहने हुए पुरुष के हाथों में दे दी, और वह उसे लेकर बाहर निकल गया। 8करूबों के पंखों के नीचे मनुष्य के हाथों के समान कुछ दिखाई देता था।
9मैंने दृष्टि की, और करूबों के पास चार पहिये खड़े थे, एक-एक करूब के पास एक-एक पहिया, और वे फीरोज़ा मणि के समान चमकते थे। 10चारों पहियों का रूप एक-सा था, मानो एक पहिये के भीतर दूसरा पहिया हो। 11जब वे चलते थे, तब अपनी चारों दिशाओं में से किसी भी ओर बिना मुड़े चले जाते थे; जिस ओर पहला पहिया मुड़ता, उसी ओर दूसरे बिना मुड़े उसके पीछे चलते थे। 12उनका सारा शरीर—पीठ, हाथ, पंख और पहिये—चारों के पहियों समेत चारों ओर आँखों से भरे हुए थे। 13उन पहियों के विषय में मेरे सुनते ही यह पुकारा गया, “घूमनेवाले पहिये।” 14हर एक के चार मुख थे: पहला करूब का मुख, दूसरा मनुष्य का, तीसरा सिंह का, और चौथा उकाब का।
15तब करूब ऊपर उठ गए। ये वही जीवधारी थे जिन्हें मैंने कबार नदी के तीर पर देखा था। 16जब करूब चलते थे, तब पहिये भी उनके पास-पास चलते थे; और जब करूब भूमि पर से उठने के लिये अपने पंख उठाते, तब भी पहिये उनके पास से न मुड़ते थे। 17जब वे खड़े होते, तब पहिये भी खड़े होते; और जब वे उठते, तब पहिये भी उनके संग उठते थे, क्योंकि जीवधारियों का आत्मा उनमें था।
18तब हमारे परमपिता की महिमा भवन की डेवढ़ी पर से हटकर करूबों के ऊपर ठहर गई। 19मेरे देखते-देखते करूबों ने अपने पंख उठाए और भूमि पर से उठकर, पहियों को अपने पास लिए हुए बाहर निकल गए। वे हमारे परमपिता के भवन के पूर्वी फाटक के प्रवेश-द्वार पर खड़े हो गए, और इस्राएल के परमपिता की महिमा उनके ऊपर ऊँचे पर थी।
20ये वही जीवधारी थे जिन्हें मैंने इस्राएल के परमपिता के नीचे कबार नदी के तीर पर देखा था, और मैं जान गया कि ये करूब हैं। 21हर एक के चार मुख और चार पंख थे, और उनके पंखों के नीचे मनुष्य के हाथों के समान कुछ था। 22उनके मुख वैसे ही थे जैसे मैंने कबार नदी के तीर पर देखे थे। हर एक सीधे अपने सामने की ओर चलता था।