आँसू, पर कोई शान्तिदाता नहीं
4 1फिर मैंने दृष्टि की और सूर्य के नीचे होनेवाला सारा अन्धेर देखा: सताए हुए लोग आँसू बहा रहे थे, और उन्हें शान्ति देनेवाला कोई न था; उनके सतानेवालों के हाथ में सामर्थ्य थी, फिर भी कोई शान्तिदाता न था। 2इसलिए मैंने मरे हुओं को, जो पहले ही मर चुके हैं, उन जीवितों से अधिक धन्य कहा, जो अब तक जीवित हैं। 3परन्तु इन दोनों से बढ़कर वह है, जो अब तक उत्पन्न ही नहीं हुआ, जिसने सूर्य के नीचे किए जानेवाले बुरे कामों को नहीं देखा। 4फिर मैंने देखा कि सब परिश्रम और सब निपुणता एक पड़ोसी के दूसरे के प्रति डाह से उत्पन्न होती है। यह भी क्षणभंगुर और वायु को पकड़ने के समान है। 5मूर्ख अपने हाथ पर हाथ धरे रहता है और अपने आप को नष्ट कर लेता है। 6चैन के साथ एक मुट्ठी उत्तम है, परिश्रम और वायु को पकड़ने के साथ दो मुट्ठियों से।
7फिर मैंने सूर्य के नीचे एक और क्षणभंगुर बात देखी:
8एक मनुष्य अकेला है, उसका कोई संगी नहीं, न पुत्र न भाई; उसके परिश्रम का कोई अन्त नहीं, फिर भी उसकी आँखें धन से तृप्त नहीं होतीं। वह पूछता है, “मैं किसके लिए परिश्रम करता हूँ, और अपने प्राण को सुख से वंचित रखता हूँ?” यह भी व्यर्थ और बुरा काम है।
9एक से दो अच्छे हैं, क्योंकि उनके परिश्रम का अच्छा फल मिलता है: 10यदि उनमें से एक गिरे, तो दूसरा उसे उठा लेगा। परन्तु हाय उस पर जो अकेला गिरे, और उसे उठानेवाला कोई न हो! 11फिर यदि दो जन एक साथ लेटें, तो वे गर्म रहेंगे; परन्तु अकेला कैसे गर्म रह सकता है? 12अकेले पर तो कोई प्रबल हो सकता है, परन्तु दो उसका सामना कर सकते हैं। तीन तागों की डोरी जल्दी नहीं टूटती।
बुद्धिमान युवक और मूर्ख राजा
13बूढ़े और मूर्ख राजा से, जो अब चितौनी मानना नहीं जानता, वह कंगाल परन्तु बुद्धिमान युवक उत्तम है। 14वह युवक बन्दीगृह से निकलकर राज्य करने आया हो, या उसी राज्य में कंगाल उत्पन्न हुआ हो। 15मैंने उन सब जीवितों को देखा, जो सूर्य के नीचे चलते-फिरते हैं, कि वे उस युवक के पीछे हो लिए, जो राजा का उत्तराधिकारी था। 16उन सब लोगों की कोई गिनती न थी, जिनके वह आगे था। तौभी जो बाद में आए, वे उससे प्रसन्न न हुए। यह भी क्षणभंगुर और वायु को पकड़ने के समान है।