अबशालोम एप्रैम के वन में मारा जाता है
18 1दाऊद ने अपने योद्धाओं की गिनती की, और उन पर हज़ार-हज़ार और सौ-सौ के सेनापति ठहराए। 2दाऊद ने योद्धाओं को भेजा: एक तिहाई योआब के अधीन, एक तिहाई सरूयाह के पुत्र, योआब के भाई अबीशै के अधीन, और एक तिहाई गती इत्तै के अधीन। राजा ने योद्धाओं से कहा, “मैं भी अवश्य तुम्हारे संग निकलूँगा।”
3परन्तु योद्धाओं ने कहा, “आप न निकलें। यदि हम भागें, तो वे हमारी चिन्ता न करेंगे; यदि हम में से आधे मारे जाएँ, तो भी वे हमारी चिन्ता न करेंगे। पर आप हम में से दस हज़ार के बराबर हैं। अच्छा यही है कि आप नगर में रहकर हमारी सहायता भेजने को तैयार रहें।”
4राजा ने उनसे कहा, “जो तुम्हें अच्छा लगे, मैं वही करूँगा।” तब वह फाटक के पास खड़ा हो गया, और सब योद्धा सौ-सौ और हज़ार-हज़ार करके निकलते गए।
5राजा ने योआब, अबीशै और इत्तै को आज्ञा दी, “मेरे निमित्त उस जवान अबशालोम के साथ कोमलता से पेश आना।” जब राजा अबशालोम के विषय में सेनापतियों को यह आज्ञा दे रहा था, तब सब योद्धाओं ने यह सुना।
6योद्धा इस्राएल के विरुद्ध मैदान में निकल गए, और एप्रैम के वन में युद्ध हुआ। 7वहाँ इस्राएल की सेना दाऊद के जनों से हार गई, और उस दिन बड़ा संहार हुआ: बीस हज़ार पुरुष मारे गए। 8युद्ध उस समस्त क्षेत्र में फैल गया, और उस दिन तलवार ने जितनों को निगला, उससे अधिक को वन ने निगल लिया।
9अबशालोम दाऊद के जनों के सामने आ पड़ा। वह अपने खच्चर पर सवार था, और जब वह एक बड़े बांज वृक्ष की घनी डालियों के नीचे से जा रहा था, तब उसका सिर वृक्ष में अटक गया। वह आकाश और पृथ्वी के बीच लटका रह गया, और उसका खच्चर उसके नीचे से आगे निकल गया। 10किसी एक मनुष्य ने यह देखा और योआब को बताया, “मैंने अभी अबशालोम को एक बांज वृक्ष में लटका हुआ देखा।”
11योआब ने उस बतानेवाले से कहा, “तो तूने उसे देखा! फिर तूने वहीं उसे मारकर भूमि पर क्यों न गिरा दिया? मैं तुझे दस दिन की मज़दूरी की चाँदी और एक कमरबन्द देता।”
12परन्तु उस मनुष्य ने योआब से कहा, “यदि मेरी हथेली में एक हज़ार दिन की मज़दूरी की चाँदी भी तौलकर रखी जाती, तौभी मैं राजा के पुत्र पर अपना हाथ न उठाता। क्योंकि हम सब ने सुना था कि राजा ने तुझे, अबीशै को और इत्तै को यह आज्ञा दी थी, ‘मेरे निमित्त उस जवान अबशालोम की रक्षा करना।’ 13नहीं तो मैं अपने ही प्राण की हानि करता, क्योंकि राजा से कुछ भी छिपा नहीं रहता, और तू भी मुझ से अलग खड़ा रहता।”
14योआब ने कहा, “मैं तेरे साथ यों समय नहीं गँवाऊँगा।” उसने अपने हाथ में तीन बर्छे लिए, और अबशालोम को, जो अब तक जीवित होकर बांज वृक्ष के बीच लटका था, हृदय में भोंक दिए। 15तब दस जवानों ने, जो योआब के हथियार ढोनेवाले थे, अबशालोम को घेर लिया, और उस पर वार करके उसे मार डाला। 16योआब ने नरसिंगा फूँका, और योद्धा इस्राएल का पीछा करने से रुक गए, क्योंकि योआब ने उन्हें रोक लिया। 17उन्होंने अबशालोम को उठाकर वन के एक बड़े गड्ढे में डाल दिया, और उस पर पत्थरों का एक बहुत बड़ा ढेर लगा दिया। और सब इस्राएली अपने-अपने घर को भाग गए।
18अपने जीवनकाल में अबशालोम ने राजा की तराई में अपने लिए एक खम्भा खड़ा कर लिया था, क्योंकि उसने सोचा, “मेरे नाम को स्मरण रखने के लिए मेरा कोई पुत्र नहीं।” उसने उस खम्भे का नाम अपने ही नाम पर रखा, और वह आज तक ‘अबशालोम की निशानी’ कहलाता है। a a v18 अबशालोम के पुत्र उत्पन्न हुए थे (2 शमूएल 14:27), परन्तु प्रतीत होता है कि वे उससे पहले मर गए, जिससे उसका नाम आगे चलानेवाला कोई उत्तराधिकारी न रहा।
दाऊद अपने पुत्र अबशालोम के लिए विलाप करता है
19सादोक के पुत्र अहीमास ने कहा, “मुझे दौड़कर राजा को यह शुभ समाचार सुनाने दो कि हमारे परमपिता ने उसके शत्रुओं से उसका पलटा लिया है।”
20योआब ने कहा, “आज तू समाचार ले जानेवाला नहीं। किसी और दिन तू समाचार ले जाना, परन्तु आज तू कोई समाचार न ले जाना, क्योंकि राजा का पुत्र मर गया है।”
21योआब ने कूशी से कहा, “जा, जो कुछ तूने देखा, वह राजा को बता।” कूशी ने योआब को दण्डवत् किया और दौड़ पड़ा।
22सादोक के पुत्र अहीमास ने योआब से फिर कहा, “चाहे जो भी हो, कृपया मुझे भी कूशी के पीछे दौड़ने दे।” योआब ने उत्तर दिया, “हे मेरे पुत्र, तू क्यों दौड़ना चाहता है? तेरे पास तो ऐसा समाचार नहीं जिसका कोई प्रतिफल मिले।”
23उसने कहा, “चाहे जो भी हो, मैं तो दौड़ूँगा।” योआब ने कहा, “दौड़।” तब अहीमास मैदान के मार्ग से दौड़ा और कूशी से आगे निकल गया।
24दाऊद दोनों फाटकों के बीच बैठा था। पहरुआ शहरपनाह के फाटक की छत पर चढ़ गया, और आँख उठाकर देखा कि एक मनुष्य अकेला दौड़ा आ रहा है। 25पहरुए ने पुकारकर राजा को बता दिया। राजा ने कहा, “यदि अकेला है, तो शुभ समाचार लाता होगा।” वह दौड़नेवाला निकट आता ही गया।
26पहरुए ने एक और मनुष्य को दौड़ते हुए देखा, और फाटक के रखवाले को पुकारकर कहा, “देख, एक और मनुष्य अकेला दौड़ा आ रहा है!” राजा ने कहा, “वह भी शुभ समाचार लाता होगा।”
27पहरुए ने कहा, “पहलेवाला तो सादोक के पुत्र अहीमास की सी चाल से दौड़ता है।” राजा ने कहा, “वह भला मनुष्य है; वह अच्छा समाचार लेकर आता है।”
28अहीमास ने राजा को पुकारकर कहा, “सब कुशल है!” उसने राजा के सामने भूमि तक झुककर दण्डवत् की, और कहा, “आपके परमपिता धन्य हैं, जिन्होंने उन मनुष्यों को सौंप दिया जिन्होंने मेरे प्रभु राजा के विरुद्ध विद्रोह किया था।”
29राजा ने पूछा, “क्या वह जवान अबशालोम कुशल से है?” अहीमास ने उत्तर दिया, “जब योआब ने राजा के सेवक को और मुझ आपके सेवक को भेजा, तब मैंने एक बड़ी हलचल देखी, परन्तु मैं नहीं जानता कि वह क्या थी।”
30राजा ने कहा, “हटकर यहाँ खड़ा रह।” तब वह हटकर चुपचाप खड़ा रहा।
31इतने में कूशी आ पहुँचा और बोला, “हे मेरे प्रभु राजा, शुभ समाचार! आज यहोवा ने उन सब के हाथ से जो आपके विरुद्ध उठ खड़े हुए थे, आपको छुड़ाया है।”
32राजा ने कूशी से पूछा, “क्या वह जवान अबशालोम कुशल से है?” कूशी ने उत्तर दिया, “मेरे प्रभु राजा के शत्रु और वे सब जो आपकी हानि करने को आपके विरुद्ध उठ खड़े होते हैं, उस जवान के समान हो जाएँ।”
33तब राजा काँप उठा। वह रोते हुए फाटक के ऊपरी कमरे में चढ़ गया, और चलते-चलते यों कहता गया: “हाय मेरे पुत्र अबशालोम! हाय मेरे पुत्र, मेरे पुत्र अबशालोम! क्या ही अच्छा होता कि मैं ही तेरे बदले मर जाता, हे अबशालोम, मेरे पुत्र, मेरे पुत्र!”