पिता की इच्छा के लिए कमर बाँधना
4 1सो, जब मसीह ने शरीर में दुःख उठाया, तो तुम भी उसी मनोभाव से अपने आप को शस्त्रयुक्त करो: क्योंकि जिसने शरीर में दुःख उठाया है, वह पाप से छूट गया। 2ताकि तुम अपने शरीर में शेष रहा हुआ समय फिर मनुष्यों की अभिलाषाओं के लिए नहीं, परन्तु हमारे परमपिता की इच्छा के लिए बिताओ। 3क्योंकि जो लोग परमपिता को नहीं जानते, उनकी इच्छा के अनुसार काम करते हुए तुम पहले ही बहुत समय बिता चुके हो: लुचपन, कुवासना, मतवालापन, रंगरलियाँ, पियक्कड़पन, और घृणित मूर्तिपूजा में जीवन बिताते हुए। 4इस पर वे अचम्भा करते हैं कि तुम अब उसी लीलाओं के बहाव में उनके साथ नहीं दौड़ते, इसलिए वे तुम्हारी निन्दा करते हैं। 5परन्तु उन्हें उसको लेखा देना होगा, जो जीवितों और मरे हुओं का न्याय करने के लिए तैयार है। 6इसी कारण उन्हें भी, जो अब मर चुके हैं, सुसमाचार सुनाया गया, ताकि वे शरीर में तो सब मनुष्यों की भाँति न्याय पाएँ, परन्तु आत्मा में हमारे परमपिता के समान जीवित रहें।
7सब बातों का अन्त निकट है। इसलिए संयमी और सचेत रहो, ताकि तुम प्रार्थना कर सको। 8सबसे बढ़कर, एक दूसरे से गहरा प्रेम रखते रहो, क्योंकि प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है। 9बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करो। 10जैसा जिसने वरदान पाया है, वैसे ही वह हमारे परमपिता के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्डारियों के समान उसे दूसरों की सेवा में लगाए। 11यदि कोई बोले, तो ऐसे बोले मानो हमारे परमपिता के वचन बोल रहा हो। यदि कोई सेवा करे, तो उस शक्ति से करे जो हमारे परमपिता देते हैं, ताकि सब बातों में यीशु मसीह के द्वारा हमारे परमपिता की महिमा हो। महिमा और सामर्थ्य युगानुयुग उसी की हैं। आमीन।
परमपिता के नाम में दुःख उठाना
12हे प्रियो, जो अग्नि-परीक्षा तुम्हारी परख के लिए तुम पर आ पड़ी है, उससे यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर हो रही है। 13वरन जैसे-जैसे तुम मसीह के दुःखों में सहभागी होते हो, वैसे-वैसे आनन्दित हो, ताकि जब उसकी महिमा प्रगट हो, तब तुम भी अति आनन्दित होकर मगन हो। 14यदि मसीह के नाम के लिए तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो तुम धन्य हो, क्योंकि महिमा का आत्मा, अर्थात् हमारे पिता का आत्मा, तुम पर छाया रहता है। 15तुम में से कोई हत्यारा, या चोर, या कुकर्मी, या दूसरों के काम में हाथ डालनेवाला होकर दुःख न उठाए। 16परन्तु यदि कोई मसीही होने के कारण दुःख उठाए, तो लज्जित न हो, वरन इस बात के लिए हमारे परमपिता की स्तुति करे कि वह इस नाम को धारण करता है। 17क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि न्याय हमारे परमपिता के घराने से आरम्भ हो; और यदि वह हम ही से आरम्भ हो, तो उनका क्या अन्त होगा जो हमारे परमपिता के सुसमाचार को नहीं मानते? 18और, “यदि धर्मी ही कठिनता से उद्धार पाएगा, तो भक्तिहीन और पापी का क्या ठिकाना?” 19इसलिए जो हमारे परमपिता की इच्छा के अनुसार दुःख उठाते हैं, वे भला करते हुए अपने प्राणों को अपने विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथ में सौंप दें।